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सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे कृष्णमूर्ति

Posted on: फ़रवरी 12, 2011

कृष्णमूर्ति

मूर्ति जी नही रहे, यह खबर सुनकर विश्वास नहीं हुआ। हालांकि उनके अस्वस्थ होने की खबर कुछ दिन पहले लग चुकी थी। 10 फरवरी को उनका असमय निधन हो गया। वे 47 वरष के थे। मूर्ति जी यानी डा, कृष्णमूर्ति सिंह रघुवंशी। वे अपने मित्रों व प्रशंसकों के बीचं मूर्ति जी के ही नाम से जाने जाते थे। वे पिपरिया से निकल कर नौकरी के सिलसिले में कई जगह रहे।

पवारखेड़ा, जबलपुर और वर्तमान में जवाहर लाल कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत पन्ना में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक के रूप में पदस्थ थे। लेकिन उनकी जो छवि मेरे मानस पटल पर अंकित है, वह है उनका गहरा सामाजिक सरोकार। ग्रामीण जनजीवन और लोकसंस्कृति में रचा-बसा ठेठ देशज अंदाज।

बरसों बाद हाल ही मेरी उनसे मुलाकाल हुई थी। कार्तिक पूर्णिमा पर सांडिया मेले हम साथ गए थे। लंबे अरसे तक मेरे क्षेत्र से बाहर रहने के कारण उनसे संपर्क टूट गया था। लेकिन पिछले साल जब मैंने साथी राजनारायण पर संस्मरण लिखा तो उन्होंने भी न केवल पढ़ा बल्कि ब्लॉग पर प्रतिक्रिया दर्ज की। इसके बाद संवाद का सिलसिला शुरु हो गया।

सांडिया मेले में हम साथ-साथ घूमे। गोपाल राठी, उनकी पत्नी श्यामा जी, श्रीगोपाल गांगूड़ा, कैलाश सराठे आदि के साथ मैं पूरे दिन उनके साथ रहा। अलग-अलग विषयों पर काफी बातचीत हुईं। ग्रामीणों को बड़ी संख्या को मेले में देखकर वे रोमांचित व उत्साहित हो रहे थे। ग्रामीण जनजीवन के प्रति उनका गहरा जुड़ाव छलक रहा था। सारंगी बजा रहे साधु को देखकर हम रूक गए। मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। मैं उनका साथ पाकर इस बात से अभिभूत था कि अपने विषयों के अलावा उनकी विविध मुद्दों में रूचि है। नर्मदांचल के लोकरंग, ग्रामीण जनजीवन,कला और संस्कृति से उनका विशेष लगाव है।

आल्हा और रामायण पर की तर्ज पर उन्होंने अपने दो वरिष्ठ साथियों नरेन्द्र मौर्य और वीरेन्द्र दुबे के साथ मिलकर बुधनी की आल्हा और जंगल रामायण की रचना की। यह साझा प्रयास था, जो कला-संस्कृति के विकास का भी इतिहास रहा है। इस क्षेत्र में चल रहे किसान-मजदूरों की हक और इज्जत की लड़ाई लड़ने वाले समता संगठन, समाजवादी जनपरिषद और किसान मजदूर संगठन में यह नया सांस्कृतिक आयाम था।

प्रख्यात समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने इस प्रयास की सराहना की। बुधनी की आल्हा पर तो शिक्षाविद् कृष्ण कुमार और वरिष्ठ पत्रकार व कवियत्री सुश्री वसंता सूर्या ने लेख भी लिखे। सराहना की। मूर्ति जी ने आल्हा का अपनी आवाज में गायन किया जिसकी कैसेट काफी लोकप्रिय हुई। गोपाल राठी ने इस पूरे प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे इसकी धुरी बने रहे।

गोपाल राठी के साथ

वीरेन्द्र जी के अनुसार मूर्ति की आवाज अलग थी। उसे भीड़ में भी पहचाना जा सकता था। मधुर और अपनी ओर खींचने वाली चुंबकीय आवाज थी। वह आवाज कानों में गूंजती थी। गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर मूर्ति जी ने स्वतंत्र लेखन भी किया। उनकी कई रिर्पोटस स्थानीय अखबार कर्मपुत्र के साथ अन्य जगह भी प्रकाशित होती रही हैं। वे विद्यार्थी जीवन से ही समता युवजन सभा, समता संगठन की गतिविधियों से जुड गए थे। उनका यह जुड़ाव अंत तक बना रहा।

शहीद भगतसिंह पुस्तकालय के वे नियमित पाठकों में से रहे हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थी। शहर के सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। उनके मित्र और शुभचिंतकों और चाहने वालों का दायरा बहुत बड़ा है। उनकी दुनिया बड़ी थी। वे बहुत ही आत्मीय, खुले और जिंदादिल इंसान थे। उनमें एक ठेठ देशजपन समाया हुआ था।

इस दौरे में उनके साथ मिलकर खेती-किसानी पर भी बात हुई। किसानों पर मंडराते अभूतपूर्व संकट से वे अवगत थे। उन्होंने कहा था हम इस पर साथ काम करेंगे। मैं उत्साहित था। लेकिन अब यह नहीं हो पाएगा। बहरहाल, उनकी स्मृति सदैव रहेगी। मूर्ति जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

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7 Responses to "सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे कृष्णमूर्ति"

कृष्‍णमूर्ति से मिलने का संयोग तो कभी नहीं हुआ , पर नरेन्‍द्र,गोपाल आदि से उनका नाम सुनता रहता था। इतनी कम उम्र में इतने उर्जावान व्‍यक्ति का चले जाना सचमुच दुखद है। हार्दिक श्रदांजलि।

जवाहर लाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत वरिष्ट कृषि वैज्ञानिक डॉ कृष्ण मूर्ति सिंह रघुवंशी का ब्रेन हेमरेज के बाद कल निधन हो गया | वे 47 वर्ष के थे | बनवारी= पिपरिया के मूल निवासी कृष्ण मूर्ति मेधावी छात्र और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | पिपरिया के छात्र आन्दोलन में उनकी अग्रणी भूमिका आज भी याद की जाती है |पिपरिया में समाजवादी विचारो के पाठन पाठन ,विचार विमर्श चिंतन के लिए जन सहयोग से स्थापित समता अध्ययन केंद्र के संचालन में उनकी विशेष दिलचस्पी थी | विद्यार्थी जीवन से ही उनका रुझान समाजवादी विचारो की ओर रहा | समता युवजन सभा, समता संगठन और समाजवादी जन परिषद् से उनका वैचारिक जुडाव मृत्यु पर्यंत बना रहा | इन्ही विचारो की प्रेरणा से उन्होंने वीरेंद्र दुबे ,नरेन्द्र मौर्य के साथ मिलकर बुधनी कांड की आल्हा व जन गीत ,आन्दोलन के गीत रचे | बुधनी कांड की आल्हा को काफी प्रसिद्धी मिली | कृष्ण मूर्ति की आवाज़ में आल्हा के कैसेट भी लोकप्रिय हुए | सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख के मुह पर कालिख पोतने की घटना के बारे में जाँच कमिटी गठित कर उसकी रिपोर्ट प्रकाशित करने का जिम्मा उन्होंने उठाया | पिपरिया के सोयाबीन कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित पानी का वैज्ञानिक व रासायनिक विश्लेषण कर उन्होंने जीव जन्तुओ व वनस्पतियों पर होने वाले प्रभावों से लोगो को अवगत कराया | इस रिपोर्ट ने सरकार को कार्यवाही करने के लिए बाध्य कर दिया था | गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े कृष्ण मूर्ति अपने दोस्तों और प्रशंसको में मूर्ति जी के नाम से जाने जाते थे | उनका अंदाज़े बयां अनूठा एवं ठेठ देशज था | पिपरिया नगर के सार्वजानिक जीवन में उनका योगदान अविस्मर्णीय है |पिपरिया नगर से उनका जीवंत रिश्ता था वे यहाँ की हर गतिविधि के बारे में जानने को उत्सुक रहते थे I
27 जनवरी 2011 को पन्ना में किसानो के बीच व्याख्यान देने के बाद उनकी तबियत अचानक बिगड़ गई |पन्ना ,जबलपुर और नागपुर में मुर्तिजी का इलाज हुआ | उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था | मस्तिस्क के दो आपरेशन होने और डाक्टारो के भरपूर प्रयास के बाद उन्हे बचाया नहीं जा सका
10 फ़रवरी 2011 की शाम उन्होंने अंतिम साँस ली | मूर्ति जी का पार्थिव शरीर 11 फ़रवरी को पिपरिया लाया गया जहाँ पचमढ़ी रोड स्थित उनके खेत में अंतिम संस्कार किया गया |शवयात्रा में परिवारजन ,स्नेही मित्रो ने बड़ी संख्या में शिरकत की |इस अवसर पर आयोजित शोकसभा में श्री तुलाराम बेमन ,गोपाल राठी ,श्री गोपाल गंगुडा ,संजीव दुबे , हरगोविंद राय ,वीरेंद्र दुबे ,बलराम बेस ,मार्शल बामोरिया, गोपाल शर्मा ,हरीश मालपानी ने अपने विचार रखे और मूर्ति के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला |सभी उपस्थित जनों ने दो मिनिट का मौन रखकर श्रधांजलि अर्पित की
गोपाल राठी
सांडिया रोड, पिपरिया 461775
मोबाइल न.09425608762, 09425408801

अफलूजी से इस दुखद समाचार सुन ने के बाद भी विश्वास नहीं हो रहा था | पिपरिया बुधनी ऐसी जगहों के अलावा कृष्णमूर्ति कई बार हम लोगों को पिपरिया से इटारसी जाने वाली रेलगाड़ी में मिल जाते थे !
उन दिनों वे पावार्खेडा में कार्यरत थे , व हमारा केसला व पिपरिया के बीच ‘आना-जाना बना ‘ रहता था |
वाकई उस जिंदादिल इंसान के गुज़र जाने का विश्वास नहीं हो रहा हैं; मन करना नहीं चाह रहा हैं |
उसकी कमी खलेगी मध्य प्रदेश में |
स्वाति

साथी कृष्णमूर्ति हमारे दिलों में जिन्दा रहे।

मैं कृष्णमूर्ति जी से पहले नहीं मिला था. मुझ अपरिचित के लिए भी समाचार बेहद दुखद है.
मैं कृष्णमूर्ति जी जैसे बहुआयामी प्रतिभा वाले जनदोस्त से उनके जीवन मैं नहीं मिल सका इसका मुझे अफ़सोस रहेगा. इसकी भरपाई भाई गोपाल राठी, अफलातून और बाबा मायाराम जैसे सुधि साथी स्मृतियाँ बाँट कर करते रहेंगे, ऐसा अनुरोध है.
पंकज पुष्कर
भारत जन आन्दोलन

Dr.Krishna murti Raghuwanshiji ko Vinmra Shradhanjali. Alaha ka cassette avm Rachana ke madhyam se Ve hamesha hamare saath rahange.

अनिल भाई द्वारा साथी कृष्णमूर्ति को श्रद्धांजलि एवं स्मरण

साथियो,

डॉ कृष्ण मूर्ति सिंह रघुवंशी के असमय निधन की खबर पाकर मैं स्तब्ध हूं। मेरे द्वारा 1992 में पिपरिया क्षेत्र छोड़ने के कारण कृष्ण मूर्ति से मेरा संपर्क टूट गया था। लेकिन चार साल पहले उनका ईमेल मिला और फिर बरसों बाद उनसे मेरा संवाद नए सिरे से शुरू हुआ। 1980 के दशक में पिपरिया में उनके साथ काम की यादें तरोताजा हो गईं।

बुधनी कांड की आल्हा के कैसट में उनकी आवाज को चेन्नई की वरिष्ठ पत्रकार व कवियत्री सुश्री वसंता सूर्या ने सुना था और उससे प्रेरित होकर फ्रंटलाईन में उसपर लेख (“Battered Budhni”) भी लिखा था। 7 दिसंबर 2007 को वसंता जी ने लिखा –

“You have seen my translation (transcreation) of the Budhni ki Aalha, I

think I sent it to you years ago. Recently it was cited in a couple of

journals as an example of modern folk poetry with a political purpose.

Now it is going to receive some attention, here in Chennai. And you

must help me.

I need an audio tape of Budhni ki Aalha within the next five days!! At

long last, this modern folk classic, composed by Raghuvanshi

Krishnamurti, Veerendra Kumar and Narendra Kumar back in 1988, has a

chance of becoming better known.

On Dec 15th 2007, I am going to read from my transcreation entitled The

Ballad of Budhni, brought out by Writers Workshop in 1992 along with

members of the excellent drama troupe Madras Players. This is a chance

to remind people of the police atrocities on which that aalha was

based. I shall also be reading excerpts from the original Hindi aalha,

and I also wish very much to play the tape in the background, just as

they sang it years ago. I had the tape with me, but just cannot find

it…and am very unhappy that the Madras audience might not get to

hear their voices, and understand what poetry, what folk poetry, and

what protest poetry are all about..

Why am I so keen on having this tape? It is musical, it is eloquent,

it is powerful! It seems to me that this deceptively simple event has

elements of the grotesque absurdity evident in Indian life, and the

way the supposedly democratic Indian state conducts itself…the

implications of this police atrocity on twenty villages, and the

incarceration of the population of an entire village, including old

women and children, in a police thana for the supposed murder of a

constable, a murder that never took place at all are evident in all

that has happened over the years since, and in the Gujarat massacre

and the Nandigram debacle also…. Habib Tanvir wanted once to produce

the Budhni ki Aalha, bilingually…it didn’t happen. Now nineteen

years later, , people can be reminded of all this..You remember

perhaps the article I wrote for Frontline years ago entitled “Battered

Budhni”.

Anil, I do not fool myself that this will definitely change ground

realities…I think though that it will have some effect on people’s

all too easy assumption that they are doing their bit as responsible

citizens…The selfish alienation of people is stupendous, and when

one thinks that one is ALSO one of those ‘people’, a kind of despair

sets in…and whips one on to do whatever one can…as long as one

can…..and send me a copy of that tape! Somebody must have it!”

इस बीच मैंने वसंता जी का संपर्क कृष्ण मूर्ति से ईमेल के जरिए करा दिया। उन्होंने बड़ी कोशिश की कि कृष्ण मूर्ति 15 दिसंबर को चेन्नई के लोक गीत उत्सव में मौजूद हों और वहां खुद ढोलक पर आल्हा गाएं। लेकिन न टेप चेन्नई पहुंच पाया और न ही कृष्ण मूर्ति । उत्सव के बाद 16 दिसंबर 2007 को वसंता जी ने सीधे कृष्ण मूर्ति को लिखा –

Dear Raghuvanshi,

I am happy to inform you that the reading/performance of your Budhni

ki Aalha and my transcreation, The Ballad of Budhni, went off very

well. It took place on Sat Dec15th morning, as the first performance

in the Poetry with Prakriti Festival being held here for the first

time. The Festival features 35 poets from many parts. Two students of

Kalakshetra chanted and played the dholak to selected verses from the

Aalha, and then the verses were again repeated, along with the

transcreation, by two fine speakers of the Madras Players, a highly

esteemed theatre group of Chennai. Both of them spoke excellent Hindi,

and managed to get the Bundeli accent correctly. I displayed your

Budhni ki Aalha, with the funny picture of Vinay Sipahi! I also spoke

of the continuing relevance of this atrocity, as the ’til see’ that

has led to the monstrous growths we see all around us.

Please inform Veerendra and Narendra, and also Gopal Rathi.

Sincerely

Vasantha Surya

मैंने सोचा कि यह छोटा-सा वृत्तांत इस दुखद मौके पर दर्ज कर दूं – शायद जब कभी कृष्ण मूर्ति पर संस्मरण लिखे जाएं तो यह किसी काम आ जाए।

इन यादों के साथ कृष्ण मूर्ति को मेरा क्रांतिकारी सलाम।

ज़िंदाबाद।

– अनिल सद्गोपाल

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