Juggnu | जुगनू

सिर्फ संत नहीं, सच्चे समाजवादी थे सुरेन्द्र मोहन

Posted on: दिसम्बर 21, 2010

सुरेन्द्र मोहन

सुरेन्द्र जी नहीं रहे, यह खबर फोन पर गोपाल भाई ने दी। मैं फोन पर उनसे ज्यादा बात न कर सका। मानस पटल पर एक के बाद एक कई छवियां उभरती – मिटती गईं। इसलिए नहीं कि मुझे उनका कुछ समय सानिध्य और वात्सल्यवत् स्नेह मिला। बल्कि इसलिए भी कि वे ईमानदार, सादगी पसंद, सहज-सरल और सैद्धांतिक निष्ठा वाले समाजवादी राजनैतिक कार्यकर्ता थे, जिनकी आज राजनीति में कमी दिखाई देती है।

सफेद-कुर्ता पायजामा, लंबी कद-काठी, चेहरे पर चष्मा और ओठों पर चिर-परिचित मुस्कान, यही सुरेन्द्र जी पहचान थी। न कोई तामझाम और न कोई औपचारिकता। वे सहज उपलब्ध थे। खासतौर से आज जब बड़े लोगों से बिना अनुमति मिल नहीं सकते, तब सुरेंद्र जी का न केवल सानिघ्य पा सकते थे बल्कि उनसे बात भी कर सकते थे।

वे आजादी की लड़ाई के सहयात्री रहे। एक-दो साल काशी विद्यापीठ में पढ़ाने के बाद फिर समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता बन गए। हालांकि फिर भी उनका पढ़ाई-लिखाई से आजीवन रिश्ता बना रहा। वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लगातार लिखते रहे। उनके लेख देश भर के हिंदी-अंग्रेजी अखबारो में छपते रहे। उनके लेखों में सदैव हाशिये के लोगों की चिंता होती थी, जो प्रायः आज मीडिया में नहीं दिखाई देती।

सत्ता के एकदम करीब रहकर भी उससे दूर बने रहे। जयप्रकाश नारायण से लेकर राममनोहर लोहिया के साथी रहे। आपातकाल में जेल भी काटी। जनता पार्टी के महासचिव रहे। बाद में राज्यसभा सांसद भी रहे। वे अपने अंतिम समय ८४ वर्श तक मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय रहे। और मृत्यु के एक दिन पूर्व तक एक धरने में शामिल हुए।

सुरेन्द्र जी बहुत ही सहज-सरल व्यक्ति थे। इसका यहां एक उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा कि जब मैं वर्श 2004 में दिल्ली के उनके ही अपार्टमेंट सहविकास में किराये से रहने लगा और इसका पता उन्हें चला तो वे खुद ही मिलने चले आए। फिर तो कई बार मुलाकातें हुईं। उनकी पत्नी मंजू मोहन जी का भी स्नेह मिला। और वे सदैव हमारा ध्यान रखती थीं।

लेकिन उनका यह स्नेह केवल मुझ से ही हो, ऐसा नहीं है बल्कि हर उस जमीनी कार्यकर्ताओं से उनका गहरा लगाव था, स्नेह था, जो जन सरोकारों से जुड़े हुए थे। देश भर में अलग-अलग समूहों से जुड़े लोग उनसे मिलने आते रहते थे। सुरेन्द्र जी के पास हर ऐसे लोगों को समय भी था। उम्मीद थी। प्रोत्साहन था। इसका एक उदाहरण देना अनुचित न होगा कि होशंगाबाद जिले में समता संगठन के उम्मीदवार श्रीगोपाल गांगूड़ा के समर्थन में वे समय निकालकर चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे। शायद इसलिए कि वे चाहते थे राजनीति में नीचे से बदलाव हो।

मुझे जो चीज सबसे प्रभावित करती है वह उनकी ईमानदारी और सैद्धांतिक निष्ठा। आज राजनीति में सिद्धांतों और मूल्यों को अयोग्यता के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन सुरेन्द्र जी, किशन पटनायक जैसे लोगों को देखकर राजनीति में संभावनाएं नजर आती हैं। और इसमें ही लोकतंत्र का भविश्य उज्जवल हो सकता है। लोकतंत्र में ही यह करिश्मा है कि समाज के निचले स्तर का आदमी शिखर पर पहुंच सकता है।

हमारे देश में हर बड़े व्यक्तित्व को महान और संत बनाने की परंपरा है। सुरेंद्र जी स्वभाव और जीवनशॆली में भले ही संत और महात्मा जैसे लगते हों, लेकिन वे सही मायनों में एक ईमानदार, सादगी पसंग, सरल और सच्चे समाजवादी थे।

Advertisements

5 Responses to "सिर्फ संत नहीं, सच्चे समाजवादी थे सुरेन्द्र मोहन"

प्रिय बाबा
साथी सुरेन्द्र मोहन जी के अवसान की खबर से मन को क्लेश हुआ, किशन पटनायक के बाद सुरेन्द्र मोहन जी जैसे नेता हमारा संबल थे | इसलिए उनकी कमी हमेशा महसूस होती रहेगी |
होशंगाबाद पिपरिया क्षेत्र के साथ उनका गहरा जुडाव पी.एस.पी.के ज़माने से था | बाद में समता संगठन और समाजवादी जन परिषद् के जनांदोलनो से उनका सक्रिय सरोकार बना रहा | मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित होने के बाद भी उनका मन देश में चल रहे छोटे छोटे जनांदोलनो में अटका रहता था | साथी सुरेन्द्र मोहन जी का चले जाना सभी किस्म के समाजवादियो , जन संगठनो व सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओ के लिए बहुत बड़ी क्षति है |
साथी सुरेन्द्रमोहन जी को इंकलाबी सलाम
गोपाल राठी
समाजवादी जनपरिषद
सांडिया रोड, पिपरिया 461775
मोबाइल न.09425608762, 09425408801

It is really shocking news that Suredramohanji left V people. Gopalji use to tell me regarding him and his association with Samta Sanghatan.My Salute to such a Loyal Son of our Mother Land.

Its very true comment written on blog by Shri Mayaram. and coment by Gopal Rathi. Surendra Mohan upto his last was in all effort to form a unity of Socialist ( According to him, All people who are fighting for equality,Justice and opposing clearly Globalisation and all form of Capitalism are Socialist) to form a unity of such Socialist leaving those ‘ who have been calling themselves socialist but in practice behaving 100% against Socialism e.g. Mulayam,Lalu,Nitish,Ramvilas,Sharad Yadav.etc. was the dream of Surendra Mihanji. we should propogate this thought.

Bahut Khub likha hai. Mujhe bhi wo sneh prapat tha, jo aapko. We Salute to SM.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

Categories

Blog Admin & Author

Blog "Juggnu" is authored by Baba Mayaram

झरोखा By Vikalp Kumar

RSS Hashiye Par

  • हमेशा नेपथ्य में रहते थे अशोक जी
    अशोक जी, यानी अशोक सेकसरिया, लेकिन हम सब उन्हें अशोक जी कहते थे. उनकी बहुत सी यादें हैं, मेरे मानस पटल पर. फोन पर लगातार बातें तो होती रहती थी,मिला भी तीन-चार बार. लेकिन जब भी मिला बहुत स्नेह मिला.जब सामयिक वार्ता, दिल्ली से इटारसी आ गई, लगातार उनसे फोन पर चर्चा होती रही.यह सिलसिला आखिर तक बना रहा. आखिरी मुलाकात उनके घर कोलकाता में 26  जून 2014 को हुई,जब मैं […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • वैचारिक जड़ता के खिलाफ पृथ्वी मंथन
    भारत में वैश्वीकरण के असर पर पर्यावरणविद् आशीष कोठारी और असीम श्रीवास्तव की नई किताब आई है- पृथ्वी मंथन। यह किताब बताती है भारत में वैश्वीकरण से क्या हो रहा है, कहां हो रहा है और इसका देश के बड़े तबके पर क्या असर हो रहा है। और जबसे यह  प्रक्रिया चली है तबसे अब तक जो विकास हो रहा है, जिस गति से हो रहा है, उसका सामाजिक और पर्यावरणीय क्या कीमत चुकाई जा रही है।ल […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • रावल जी की याद
    समाजवादी चिंतक और जन आंदोलनों के वरिष्ठ साथी ओमप्रकाश रावल जी की कल पुण्यतिथि है। 23 बरस बीत उनका निधन हुए, लेकिन उनकी स्मृति सदैव बनी रहती है। लंबी कद काठी, सफेद कुर्ता पायजामा, चेहरे पर मोटी फ्रेम का चश्मा और स्मित मुस्कान उनकी पहचान थी। पुरानी लूना से शहर में कार्यक्रमों में इधर उधर जाना। बिल्कुल बिना तामझाम और दिखावे के, सहज।सोचता हूं उन पर लिखूं, फिर यह […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • विकल्प खोजने वाले विचारक
    किशन जी (किशन पटनायक) का स्मरण करते ही कितनी ही बातें खयाल में आती हैं। उनकी सादगी, सच्चाई और आदर्शमय जीवन की, दूरदराज के इलाकों की लम्बी यात्राओं की, राजनीति के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की कोशिशों की और उनके ओजस्वी व्याख्यानों की, जहां लोग चुपचाप उनके भाषणों को सुनते रहते थे।किशन जी की याद और उन पर लिखना इसलिए जरूरी नहीं है कि वे हमारे प्रेरणास्त्रोत थे, […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)

Join 3 other followers

Blogvani.com
%d bloggers like this: