Juggnu | जुगनू

राजनारायण केसला वारे, सांचहु बहुत हौसला वारे

Posted on: अप्रैल 26, 2010

राजनारायण

वर्ष 1989 की बात है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को चिट्‌ठी लिखकर इस क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराया था। इस चिट्‌ठी ने देश का ध्यान इस अंचल के आदिवासियों की समस्याओं की ओर खींचा। केसला विकासखंड आदिवासी बाहुल्य है और यहां कई परियोजनाओं से आदिवासी उजड़े हैं। यह चिट्‌ठी उन्होंने जेल से लिखी थी। इन कार्यकर्ताओं का कसूर यह था कि उन्होंने आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई में साथ दिया था। जिन दो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिट्‌ठी लिखी थी उनमें से एक राजनारायण था जिसका एक सड क हादसे में 26 अप्रैल 1990 को निधन हो गया। उसकी 20 वीं पुण्यतिथि है।

राजनारायण के बारे में जब मैं सोचता हूं तो मेरे स्मृति पटल पर उसकी कई छवियां उभर आती हैं। दुबला-पतला, दाढी और चश्मा वाला तेजतर्रार आदर्शवादी युवक। शांत और मिलनसार मित्र। अभाव और मुशिकलों में अडिग रहना वाला कार्यकर्ता। जंगल और पहाड़ में रहने वाले आदिवासियों का सच्चा हमदर्द। अन्याय के खिलाफ हाथ उठाकर जोशीले नारे लगाने वाला साथी। धरना और जुलूस में ठेठ लोक शेली में मस्ती से गीत गाने वाला समाजवादी।

आज जब नई पीढी प्रतियोगिताओं को पार कर इस व्यवस्था में अपने भविष्य की तलाश कर रही है तब कुछ बरस पहले इटारसी का एक युवक सब कुछ छोड कर समाजवादी सपने को साकार करने के लिए जंगल के बीच अकेला ही रहने लगा, यह कुछ अजीब सा लगता है। राजनारायण ही वह युवक था। 80 के दशक में कुछ समाजवादियों के संपर्क में आने के बाद वह आदिवासी बहुल विकासखंड केसला के पास बांसलाखेडा ( सहेली ) में रहने लगा था। यहां विखयात समाजवादियों ने लोहिया अकादमी नामक समिति बनाई थी जिसमें 50 एकड से ज्यादा जमीन थी।

राजनारायण इटारसी के एक शिक्षक का बेटा था। बी. कॉम की पढ़ाई बीच में ही छोड कर ही उसका समाजवादी विचारों की तरफ रूझान बढा। वह पहले युवा जनता में शामिल था और वह यह समझ गया कि मौजूदा राजनैतिक दल आम जनता की समस्याओं को हल करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच मैदानी काम करना जरूरी है। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक व समाजवाद के संपर्क में आया और उनके मार्गदर्शन में आदिवासी और किसानों को संगठित करने में लग गया। समता संगठन से जुड गया, जो मुखयधारा की राजनीति से अलग समाजवादी विचारों का एक राजनैतिक संगठन था। 1995 में यह समाजवादी जनपरिषद नामक राजनैतिक दल में समाहित हो गया। आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई को आगे बढाने के लिए स्थानीय स्तर पर वर्ष 1985 में किसान आदिवासी संगठन नामक संगठन बनाया था।

इधर पिपरिया में भी गोपाल राठी जैसे समाजवादी युवकों से राजनारायण की मित्रता थी जो समय-समय पर उसे मदद करते थे। जब कभी राजनारायण को अपने कामों से अवकाश मिलता, वह पिपरिया के साथियों से आकर जरूर मिलता था। धीरे-धीरे केसला के आदिवासियों के दुख-दर्द अब बाहर आने लगे थे। बाद में जवाहरलाल विश्वविद्यालय की पढ़ाई अधूरी छोड कर सुनील भी राजनारायण के साथ मिलकर आदिवासियों की हक और इज्जत की लडाई में शामिल हो गए। बाद में उनकी पत्नी स्मिता भी आ गईं। आलोक सागर और सुरेन्द्र झा भी टीम में शामिल हो गए। इसके बाद तो धरना, जुलूस, पदयात्राओं का सिलसिला शुरू हो गया।

केसला, इटारसी, होशंगाबाद और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल तक आदिवासी गए। भोपाल से बैतूल की सडक जुलूस और रैलियों की गवाह बनी। यहां आदिवासियों का तथाकथित विकास के लिए कई बार विस्थापन की पीडा से गुजरना पडा है। तवा बांध, प्रूफरेंज, आर्डिनेंस फैक्टी विस्थापन हुआ। उजडे-उखडे लोगों को न मुआवजा मिला और न ही जमीन। और जो थोडा बहुत मुआवजा मिला भी तो वह इतना कम था कि वह विस्थापितों के मजाक ही कहा जाएगा।

इटारसी के आगे बागदेव के पुल के इस तरफ की दुनिया और उस तरफ जंगल में आदिवासियों की दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर है। इस तरफ जंगल से डर कर भागने वाले लोग थे और दूसरी तरफ जंगल में ही रहने वाले लोग थे। एक तरफ भोगवादी जीवन के आदी लोग थे दूसरी प्रकृति के साथ

सबसे कम संसाधनों में जिंदा रहने वाले लोग थे जिनसे उनके ये प्राकृतिक संसाधन छीनने की कोशिश की जा रही थी। राजनारायण ने इन्हीं गोंड-कोरकू आदिवासियों की

आवाज को बुलंद किया। जो गोंड-कोरकू आदिवासी शर्ट-पेंट पहने आदमी को देखकर सहम जाते थे। वे सड़क पर अपने हकों के लिए खडे होने लगे।

वर्ष 1985 के आसपास मैं बांसलाखेडा पहली बार गया था और एक महीने रहा था। हरे-भरे जंगल के बीच नदी किनारे का यह स्थान बहुत ही रमणीक था। राजनारायण अपने मां-बाप के साथ रहते थे। सुनील जी उसी समय दिल्ली से यहां आए थे। सुनील जी और राजनारायण के साथ कई गांवों में घूमा। एक माह बाद पानी के लिए होशंगाबाद तक पदयात्रा हुई। जब पदयात्रा पथरौटा पहुंची तब राजनारायण ने वहां साइकिल रिक्शे पर बैठकर माइक से लोगों को संबोधित किया। वह जोश से भरा चेहरा मेरे आंखों के सामने तैर रहा है।

वह जनता के साथ एकाकार हो गया था। गांव-गांव घूमना, लोगों के साथ उठना-बैठना। उनके दुख-तकलीफों को सुनना-समझना और उन्हें संगठित करना, उसका काम था। वह गांव जाकर आने के लिए उतावला नहीं होता था। वह वहां रूकता था, खाता-पीता था और लोगों के साथ बैठकें करता था। बाद में उसने जो आंदोलन के बीज बोए वह बैतूल, सिवनी-मालवा और बनखेड़ी-पिपरिया तक पहुंच गए।

राजनारायण

मुझ जैसे राजनारायण के मित्र हैं, जिन्हें वह उम्मीद की किरण था। अब राजनारायण नहीं है। सुनील जी हैं, उन्हें तो लोग कई बार राजनारायण ही समझते हैं। कद-काठी और दाढी-चशमे के कारण सुनील और राजनारायण में फर्क करना मुद्गिकल है। राजनारायण की याद में एक नारा लगाया जाता था कि साथी तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएंगे, यह सफर जारी है। साहित्यकार

कश्मीर उप्पल ने लिखा है कि यह मसीहा पहाडी पर एक तेज आंख की तरह हमें देखता रहेगा

और राह भी दिखाएगा। ऐसे सच्चे, आदर्शवादी समाजवादी मित्र के व्यक्तित्व से सीखकर हम कुछ कर पाएं तो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-बाबा मायाराम

                                                       

Advertisements

16 Responses to "राजनारायण केसला वारे, सांचहु बहुत हौसला वारे"

साथी राजनारायण मरा नहीं ,
हमारे दिलों में जिन्दा है ।

साथी राजनारायण और हमने साथ साथ समाज को बदलने का सपना देखा था |
आज बाबा मायाराम जी के ब्लॉग में राजनारायण के बारे में पढ़ते हुए पुराने दिनों की याद आ गई |
बात मेरी शादी ( 5 मई1986 ) की है | राजनारायण ने मेरी शादी में अन्य मित्रो के साथ शिरकत की थी |
चूँकि मेरी शादी परम्परागत रीति रिवाज़ से हुई थी इस लिए राजनारायण ने शादी में खाना तक नहीं खाया
उसका तर्क था की घोड़े पर बैठकर सामंती तरीके से शादी समाजवादी कैसे हो सकती है ?

इस बहिष्कार के बावजूद हमारा स्नेह और मज़बूत हुआ |
और मृत्यु पर्यंत हम अच्छे दोस्त और राजनैतिक साथी बने रहे |
अपने प्रिय साथी का पुण्य स्मरण करते हुए इन्कलाब जिंदाबाद

साथी तेरे सपनो को मंजिल तक पहुचाएंगे

गोपाल राठी
सांडिया रोड, पिपरिया 461775
मोबाइल न.09425608762, 09425408801

माफ करें। यहां यह स्‍पष्‍ट नहीं हुआ कि यह लेख किसने लिखा है। संभवत: बाबा मायाराम ने। अगर अपना नाम भी नीचे दें तो बेहतर होगा।
यह संयोग ही है कि राजनारायण और मैं ग्‍यारहवीं कक्षा में सहपाठी थै। हम दोनों ही इटारसी के पीपलमोहल्‍ला के उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालय में जीवविज्ञान विषय लेकर डाक्‍टर बनने के सपने देखा करते थे। लेकिन उस समय राजनारायण की गिनती कक्षा के सबसे आवारा लड़कों में होती थी।
इटारसी में ही भारत टाकीज के पास,जो मुझे याद पड़ता है,भारत स्‍टूडियो हुआ करता था,जो संभवत राजनारायण के भाई या किसी परिचित का ही था।
ग्‍यारहवीं के बाद मैं खंडवा चला गया और हमारा संपर्क टूट गया। यह 1975 की बात है।
बाद में जब राजनारायण से होशंगाबाद में मुलाकात हुई तो वह युवा जनता का युवा नेता बनने की राह पर था। उन दिनों रघु ठाकुर युवा जनता में हुआ करते थे।
मैं यह देखकर चकित था कैसे एक आंदोलन या विचारधारा किसी युवक को बिलकुल बदल देती है। मुझे यकीन नहीं होता था कि क्‍या यह वही राजनारायण है जो मेरे साथ पढ़ता था।
बाद में राजनारायण से कई बार भेंट हुई। राजनारायण अब नहीं है। पर मैं कभी कभी सोचता हूं हममें से,स्‍वयं मैंने,
कितनों में राजनारायण की तरह रास्‍ता चुनने का माद्दा रहा।
राजनारायण भाई तुम्‍हें लाल सलाम।

राजनारायण को मैं अपना भाई व नेता मानती हूं।
१९८५ कि गर्मियों से बांसला-खेडा जाना शुरु किया। समता संगठन व किसान आदिवासी संगठन के कार्यक्रमों में शरीक होना, किसी भी साल का सबसे सार्थक अनुभव होता।
“आधी रोटी खायेंगे, पट्टा ले कर जायेंगे ” के नारे,जैसे कयी प्रेरणादायक नारो के साथ हम सब साथियों ने होशन्गाबाद कलक्टरेट पर कै दिनो धरना दिया था।
“ओ बहरी सरकार सुन लैये” गीत यहीं राजनारायण ने रचा था।
सिवनी माल्वा से पद यात्रा के लिये लोगों को तय्यार कैसे करना होता है, यह पहला व्यावहारिक पाठ राज्नारायण ने ही सहज सिखाया।
उसको हर साल २६ अप्रैल की सुबह याद कर नमन करती हूं।

स्वाति

राजनारायण जी ओर सुनीलजी के साथ समाजबदी आंदोलनों में कुछ दिन का सफ़र मेरा भी रहा है
मुझे अपने वर्तमान कम काज में इन आंदोलनों के कारण सोच का दायरा बढ़ा है.
राजनारायण जी को सलाम

Main itna kuchh kahna chahata hun ki kuchh kanhu usse pehle baaton ka juggada ban jata hai, baaten appas main ulajh jati hain, kaise niwarun, kaise suljhaun. ek saath kitni filmain ek hi parde par chal rahi hain. Saathi RAJNARAYAN ke vishay main kahna itna saral aur itna kathin aadmi birla hi paida hota hai. suruaat main laga ki sayad aisa aadmi hai jiske paas kam nahi hai magar jab sampark badhe tab samajh main aaya ki jo rajnaran karte hain vohi sarthak kam hai baki to sab roji roti main lage hain .
baki bad main vande mataram

hamare aaspaas hi na jaane kitne ” UNSONG HERO ” hai jinhe me nahi jaanti lekin sia ke blog ne un sabhi se mera parichaya karana shuru kar diya hai . sapana saccha hota hai to mangil jaroor milti hai aurRAJNARAYAN ji ke sapno ko hum jaise log poora karenge .

राजनारायण जी से मैं वाकिफ नहीं था लेकिन उनके जज्बे और संघर्ष को सामने लाकर आपने अच्छा काम किया है. दरअसल अब ऐसे जुझारू तेवर वाले युवा नहीं रहे. वंचितों और आदिवासियों को भूमंडलीकृत विकास के माडल में अवांछित माना जा रहा है. यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है.

जिस वर्ष मेरा जन्म हुआ, उसी साल ४ महीने पहले साथी राजनारायण का देहांत हुआ था, लेकिन बचपन से उनके बारे में सुनते और समझते हुए उनकी कमी को मैंने भी शिद्दत से महसूस किया. इस कठिन दौर में आशा है उनकी विरासत को आगे ले जाने में हम सफल होंगे. धन्यवादसहित
बालू (इकबाल अभिमन्यु )

Sathi Rajnarayan per lekh parkar purane din yad aa gaye.wah jabaj tha. samvedanshil tha. Garibo, Aadiwisiyao ka hamdard,humsafar tha. Rajnarayan aur Sunil H’bad jail me band the hum log bahar nare laga rhe the. Acsident ke bad Rajnarayan ka Shav I’si laya gya .Hum log Juloos me nare lage chale.SATHI TERE SAPNO KO MANZIL TAK PAHUCHAYENGE.Es ghangor wikat daur me Rajnarayan Jaise Jujhru Sathi ki yad karna behad jaruri hai. Baba ko es nek kam ke liye Daybad.
Mukesh

ऐसे किरदारों के बारे में कई लोग नहीं जानते। अगली कुछ पीढ़ियाँ शायद सोचे कि ऐसे भी लोग होते थे! जैसे आइंस्टीन ने गाँधीजी के लिए कहा था।

राजनारायण को मैं अपना भाई व नेता मानतk हूं।
१९८५ कि गर्मियों से बांसला-खेडा जाना शुरु किया। समता संगठन व किसान आदिवासी संगठन के कार्यक्रमों में शरीक होना, किसी भी साल का सबसे सार्थक अनुभव होता।
“आधी रोटी खायेंगे, पट्टा ले कर जायेंगे ” के नारे,जैसे कयी प्रेरणादायक नारो के साथ हम सब साथियों ने होशन्गाबाद कलक्टरेट पर कै दिनो धरना दिया था।
“ओ बहरी सरकार सुन लैये” गीत यहीं राजनारायण ने रचा था।
सिवनी माल्वा से पद यात्रा के लिये लोगों को तय्यार कैसे करना होता है, यह पहला व्यावहारिक पाठ राज्नारायण ने ही सहज सिखाया।
उसको हर साल २६ अप्रैल की सुबह याद कर नमन करत हूं।

Main itna kuchh kahna chahata hun ki kuchh kanhu usse pehle baaton ka juggada ban jata hai, baaten appas main ulajh jati hain, kaise niwarun, kaise suljhaun. ek saath kitni filmain ek hi parde par chal rahi hain. Saathi RAJNARAYAN ke vishay main kahna itna saral aur itna kathin aadmi birla hi paida hota hai. suruaat main laga ki sayad aisa aadmi hai jiske paas kam nahi hai magar jab sampark badhe tab samajh main aaya ki jo rajnaran karte hain vohi sarthak kam hai baki to sab roji roti main lage hain .
baki bad main vande mataram mana tawa matsya sangh, kesla ma 10 years worked kia hai rajnarayan ki yad ma 10 sal bita diya hai. mera niwas bhi surajgung itarsi ma hai.

राजनारायण जी से में एक बार ही मिली थी पर अख़बार में उनकी मृत्यु की खबर पढते ही मै सन्न रह गई थी. वास्तव में उनकी जगह कोई पूरी नहीं कर सकता है.

जैसा कि समाचार मेँ पढा राज नारायण जैसे निष्टावान ,कर्मठ, इरादोँ के पक्के लोग दुनियाँ मेँ कम होते है।अब वह इस संसार मेँ नही है किन्तु समाज के लिए वे सदैव प्रेरणा बने रहेगेँ.मेरा नमन।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

Categories

Blog Admin & Author

Blog "Juggnu" is authored by Baba Mayaram

झरोखा By Vikalp Kumar

RSS Hashiye Par

  • हमेशा नेपथ्य में रहते थे अशोक जी
    अशोक जी, यानी अशोक सेकसरिया, लेकिन हम सब उन्हें अशोक जी कहते थे. उनकी बहुत सी यादें हैं, मेरे मानस पटल पर. फोन पर लगातार बातें तो होती रहती थी,मिला भी तीन-चार बार. लेकिन जब भी मिला बहुत स्नेह मिला.जब सामयिक वार्ता, दिल्ली से इटारसी आ गई, लगातार उनसे फोन पर चर्चा होती रही.यह सिलसिला आखिर तक बना रहा. आखिरी मुलाकात उनके घर कोलकाता में 26  जून 2014 को हुई,जब मैं […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • वैचारिक जड़ता के खिलाफ पृथ्वी मंथन
    भारत में वैश्वीकरण के असर पर पर्यावरणविद् आशीष कोठारी और असीम श्रीवास्तव की नई किताब आई है- पृथ्वी मंथन। यह किताब बताती है भारत में वैश्वीकरण से क्या हो रहा है, कहां हो रहा है और इसका देश के बड़े तबके पर क्या असर हो रहा है। और जबसे यह  प्रक्रिया चली है तबसे अब तक जो विकास हो रहा है, जिस गति से हो रहा है, उसका सामाजिक और पर्यावरणीय क्या कीमत चुकाई जा रही है।ल […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • रावल जी की याद
    समाजवादी चिंतक और जन आंदोलनों के वरिष्ठ साथी ओमप्रकाश रावल जी की कल पुण्यतिथि है। 23 बरस बीत उनका निधन हुए, लेकिन उनकी स्मृति सदैव बनी रहती है। लंबी कद काठी, सफेद कुर्ता पायजामा, चेहरे पर मोटी फ्रेम का चश्मा और स्मित मुस्कान उनकी पहचान थी। पुरानी लूना से शहर में कार्यक्रमों में इधर उधर जाना। बिल्कुल बिना तामझाम और दिखावे के, सहज।सोचता हूं उन पर लिखूं, फिर यह […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)
  • विकल्प खोजने वाले विचारक
    किशन जी (किशन पटनायक) का स्मरण करते ही कितनी ही बातें खयाल में आती हैं। उनकी सादगी, सच्चाई और आदर्शमय जीवन की, दूरदराज के इलाकों की लम्बी यात्राओं की, राजनीति के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की कोशिशों की और उनके ओजस्वी व्याख्यानों की, जहां लोग चुपचाप उनके भाषणों को सुनते रहते थे।किशन जी की याद और उन पर लिखना इसलिए जरूरी नहीं है कि वे हमारे प्रेरणास्त्रोत थे, […]
    noreply@blogger.com (Baba Mayaram)

Join 3 other followers

Blogvani.com
%d bloggers like this: