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बेहतर समाज का सपना देखने वाली हस्तियों की याद में

Posted on: फ़रवरी 25, 2010

हाल ही में २० फरवरी को मेरा इंदौर जाना हुआ। मौका था- रावल जी यानी ओमप्रकाश रावल और महेन्द्र भाई यानी महेन्द्र कुमार की स्मृति कार्यक्रम का। रावल जी की यह १५ वीं पुण्यतिथि थी और महेन्द्र भाई की ७ वीं। दोनों में समानता यह है कि वे जन संगठनों के बड़े हिमायती थे और सामाजिक क्षेत्र में रूचि रखने वाले युवाओं की पीठ पर हाथ रख उन्हें आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसलिए आयोजकों ने भी दोनों विभूतियों का अनूठा संयुक्त कार्यक्रम का आयोजन किया। यह हर वर्ष होता है।

इन्दौर जब भी जाना होता है, मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। यह शहर मेरे लिए तीर्थस्थान की तरह है। जो कुछ सुंदर और अच्छा है उसे हम तीर्थस्थानों में खोजते हैं। इन्दौर का मेरे जीवन में खास महत्व है क्योंकि यहां ओमप्रकाश रावल, महेन्द्र भाई, गुरूजी यानी विष्णु चिंचालकर, काशीनाथ त्रिवेदी और राहुल बारपुते जैसी हस्तियां थी, जो अपने-अपने क्षेत्र में शिखर पर थे। श्रद्धा और सम्मान इसलिए भी ज्यादा होता है क्योंकि मुझे न केवल इन सबका सानिध्य प्राप्त हुआ बल्कि पुत्रवत स्नेह भी मिला।

साल में अलग-अलग विषयों पर होने वाले व्याखयान ने अब एक परंपरा का रूप ले लिया है। यह केवल रस्मी तौर पर नहीं, बल्कि जनजीवन से जुड़े ज्वलंत विचारों के आदान-प्रदान का मंच है। इस आयोजन से राकेश दीवान, चिन्मय मिश्र व सिद्धार्थ भाई जैसे विचारवान लोग जुडे हुए हैं। इस बार रावल जी के पुत्र असीम और उनकी पत्नी लोरा भी इस कार्यक्रम में आई थीं।

जाल सभागृह का हाल खचाखच भरा हुआ था। इस बार व्याखयान देने कृषि विशेषज्ञ देवेन्दर शर्मा आए थे। विषय था- खाली होती थालीः गहराता खाद्यान्न संकट। यह विषय मौजूं है विषय था- इस वर्ष महंगाई ने सबको रूला दिया। दाल के दाम इतने बढ गए कि लोगों की पहुंच से बाहर हो गए। इसके अलावा बीटी बैंगन का मामला भी सामने आया जिसका देश भर में काफी विरोध हुआ। और अंततः बीटी बैंगन को फिलहाल मंजूरी नहीं मिली।

ओमप्रकाश रावल समाजवादी चिंतक व विचारक होने के साथ अपने उतरार्ध जीवन में एक एक्टिविस्ट हो गए थे। चाहे नर्मदा बचाओ आंदोलन हो, एकता परिषद हो या होशंगाबाद का किसान आदिवासी संगठन। वे इनके कार्यक्रमों में जरूर पहुंचते। और लौटकर अखबारों में उस पर लिखते।

असल में रावल जी छोटे-छोटे जन संगठनों से ही एक वैकल्पिक शक्ति के निर्माण का सपना देख रहे थे। वे एक बेहतर का सपना देख रहे थे। इसी को वे रियल पॉलिटिक्स कहते थे। उल्लेखनीय है कि वे आपातकाल के दौरान मीसा के तहत बंदी रहे और १९७७ में जनता शासन में शि राज्यमंत्री भी रहे।

रावल जी अपने लंबे राजनैतिक व सामाजिक जीवन के अंतिम वर्षों में दलगत राजनीति से अलग होकर मैदानी जन संगठनों से जुड़ गए थे और उनमें लगे युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं में संभावनाएं देखते थे। उन्होंने कई सामाजिक कार्यकर्ता बनाए और प्रशिक्षित किए। उनमें से कई पत्रकार व अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

रावल जी की एक खासियत और थी, वे बहुत ही सादगी पसंद व्यक्ति थे। सहज और मिलनसार तो थे ही। वे मितभाषी होते हुए भी दूसरों को लंबी-चौडी बातें सुनने का धीरज रखते थे। नपे-तुले शब्दों में कही गई उनकी बात हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को सीख की तरह होती थी।

महेन्द्र भाई सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक संपादक थे। वे इसके माध्यम से हमेशा मैदानी जन संगठनों व उनके मुद्‌दे सामने लाते रहे। जल, जंगल, जमीन, खदान, विस्थापन, बडे बांध, पर्यावरण पर जोर देते थे। वे सप्रेस के माध्यम से हमेशा नए-नए लेखकों को तैयार करते थे। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों की सप्रेस पाठशाला होती थी।

सप्रेस का कोई व्यवस्थित दफतर भी नहीं था, घर के छोटे से कमरे से ही उनका सब काम-काज होता था। वे एक छोटी सी टेबल पर ही सारा लेखन व संपादन का सभी कार्य करते थे। यहीं से पूरे देश के अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं को सप्रेस का बुलेटिन भेजते। इस काम में उन्हें पूरे घर के सदस्यों का सहयोग मिलता। यहां तक उनके पोता भी लिफाफे पर गोद लगाता था। वे कहते थे कि जैसे किसान को खेती करनी है तो खेत पर रहना पड़ता है। इसलिए घर और दफतर अलग बनाने की जरूरत नहीं है।

सप्रेस का ५० वां वर्ष चल रहा है। वह वैकल्पिक मीडिया की वाहक रही है। १९६० में इन्दौर आए विनोबा भावे से मात्र एक रूप्ये की सहयोग राशि लेकर सप्रेस की शुरूआत महेन्द्र भाई ने की थी जिसके ५० वां वर्ष चल रहा है। कार्यकारी संपादक चिन्मय मिश्र हैं और इसमें उनके दोनों बेटे सिद्धार्थ और सम्यक भी लगातार अपना योगदान कर रहे हैं।

मालवा की इन दोनों हस्तियों की स्मृति में हुआ कार्यक्रम बहुत आत्मीय था। और कार्यक्रम समाप्ति के बाद मैं सोच रहा था कि क्या हम इन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से कुछ सीखकर आगे कुछ कर पाएंगे?

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3 Responses to "बेहतर समाज का सपना देखने वाली हस्तियों की याद में"

बिल्कुल सही कहा आपने, ऐसे महान व्यक्तित्व का हमें अनुसरण करना चाहिए , आपने बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति की ।

क्या हम इन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से कुछ सीखकर आगे कुछ कर पाएंगे?
यही बडा प्रश्‍न है .. क्‍यूंकि हम हमेशा पैसेवालों , पदवालों का अनुकरण करना चाहते हैं !!

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