Juggnu | जुगनू

’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया

Posted on: जनवरी 14, 2010

पर्यावरण बचे पर लोग भी बचें
वीरेन्द्र दुबे

‘सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नाम की छोटी सी किताब अपने नाम से ही मोहती है। खासकर उन लोगों को जो नर्मदा विंध्यांचल के समानान्तर अमरकंटक से असीरगढ़ तक विशाल पर्वतमाला के रूप में सतपुड़ा को पहचानते हैं।

किताब में इस विशाल भूभाग के एक जिले (होशंगाबाद) के तीन ब्लाकों के कुछ गांवों की झलकियां बहुत सार संक्षेप बल्कि सूत्र रूप में दिखलाने का कमाल किताब के लेखक बल्कि कुशल संग्राहक बाबा मायाराम ने किया है।

सतपुड़ा के बाशिन्दे

मोटे तौर पर यह किताब विस्थापन और उससे जुड़े सीधे असर पर केन्द्रित है। मगर किताब में मौजूद सामग्री, पर्वतमाला में भौगोलिक, सांस्कृतिक और कथित विकास के चलते हो रहे बदलावों की तरफ बरबस ध्यान खींचते ही नहीं बल्कि वहीं अटका भी देते हैं।

हमें सोचने-विचारने और कम से कम अपने स्तर पर करने की प्रेरणा देने की सफल कोशिश किताब के छोटे-छोटे शिर्शकों में बंटे वृतांत्त अपने सवालों की लम्बी कतारों के साथ मौजूद हैं। जो इसे देशव्यापी और एक हद तक बुनियादी त्रासदियों की तरफ ध्यान आकर्षित करने से नहीं चूकते।

किताब की झलकियां हमारे सामने ऐसे-ऐसे सजीव दृश्य पेश करती चलती हैं कि पढ़ने के साथ देखने और सुनने का सुख भी देती है। क्योंकि आम तौर पर इस तरह के मुद्दों पर लिखा जाने वाला साहित्य शुष्क , आंकड़ेबाजी का गट्ठा और बयानों वक्तव्यों की टोकरी होता है। उसकी भाषा और लहजा भी उसको अपठनीय जरूर बना देता है। सतपुड़ा के बाशिन्दे इस मायने में एक बेहतर उदाहरण है। इस तरफ भी पढ़ने और कुछ करने वालों को विचारने के लिए किताब उकसाती है।

बच्चे नौजवान, महिलाओं और बुजुर्गों के वर्गों के विचारों और सम्वेदनाओं के साथ साझेदारी करके इन रपटों को व्यापक अर्थ मंे सांस्कृतिक दस्तावेज की शक्ल दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानव अधिकार और लोक संस्कृति जैसी चुनौतियों से जुड़ी चिन्तायें मजबूर करती हैं कि जब इतने में सेम्पिल एरिया में यह स्थिति है तो इस लम्बी-चैड़ी फैली पर्वतमाला की समग्र तस्वीर क्या होगी? क्या वह इससे अलग है? मिलती-जुलती है? अथवा और भी विविध मुद्दे इन बाशिन्दों के भूत, वर्तमान और भविष्य के प्रभावित किए हुए हैं।

लेखक ने जिस मेहनत और गागर में सागर समेटने के शिल्प का इस्तेमाल किया है, वह उसमें यह अपेक्षा भी जगाता है वह सेम्पिल टेस्टिंग की बजाय और लोगों को जोड़कर अमरकंटक से असीरगढ़ तक लम्बाई-चैड़ाई में फैले सतपुड़ा पर्वत और उसके बाशिन्दों की व्यथा को दस्तावेजीकरण करने की इस शेली में पढ़ने, सोचने और कुछ करने की इच्छा-आकांक्षा रखने वालों के लिए उपकार होगा।

किताब के मुखपृष्ठ पर इंदिरा नगर के बच्चे सुखीराम का बाघ का मोहक चित्र और अखीरी कवर पर भवानी प्रसाद मिश्र की सतपुड़ा के घने जंगल का एक अंष किताब को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका के तौर पर उभरकर आए हैं।

विपरीत परिस्थितियां, विकराल समस्याओं व विरोधाभासों से भरी विनाशकारी विकास योजनाओं के लिए रचनात्मकता से भरी पूरी संभावनाओं की तरफ रिपोर्ट बार-बार इशारा करती है।

किताब पर्यावरण की रक्षा और रोजी-रोटी के गहरे सम्बंधों के मानवीय नजरिये से देखने के नीति निर्धारकों को कटघरे में खड़े करके ईमानदार बयान और कारगर उपायों की पुरजोर मांग भी करती है।

किताब के साथ कापीराइट का चक्कर न होना क्षेत्र के छोटे अखबारों के लिए शानदार मौका है। वे इस सामग्री का, इसके आधार पर अपने इलाके का कच्चा चिट्ठा लोगों के सामने रख सकते हैं। कम ज्यादा समस्याओं से तो पूरा पहाड़ जूझ रहा है और उसे कुछ सूझबूझ नहीं रहा है। लोगों के लिए ईमानदारी से लिखने -कहनेवालों के लिए किताब कमाल की आधारभूमि है। वे इसका उपयोग करें।

किताब की विश्वनीयता उसमें दर्ज लोगों के वेबाक बयान हैं जिनमें उनकी विवशता और विश्वास दोनों अलग-अलग तरीके से झलकते हैं। यहां कुछ उदाहरण हैं जो अपने में किसी कहानी कविता के हिस्सों जैसा अहसास कराते हैं। जीवंत कथाओं के पढ़ने वालों के लिए ये किताब भी समान सुख देगी। कुछ उदाहरण हैं जिन पर गौर करें।

“जब कोई चिड़िया का घौंसला तोड़ देता है तो उसे बनाने में कितनी मुशिकल होती है फिर हमारा तो पुराना घर था, जमीन थी, पेड़ों की घनी छांव थी, वहां का वातावरण ठंडा था। हमें वहां से हटा दिया, न कोई मुआवजा मिला न जमीन। 30 साल बाद भी हमें पुराने गांव की वैसी ही याद आती है जैसे वह कल ही की बात हो।”

“हम सिर्फ बाजार से नमक और कपड़ा खरीदते हैं। बाकी जरूरत की चीजें अपने खेत में ही पैदा करते हैं। यहीं हम अच्छे हैं। जंगल से बाहर हमें ऐसी हरी-भरी खेती, पर्याप्त पानी,जंगल पहाड़ और आजादी कहां मिलेगी?”

“बचपन की बहुत सी अच्छी यादें हैं। हम जंगल से माहुल के फल खाते थे। अचार, तेंदू, महुआ खाते थे। नदी में कूद-कूदकर नहाते थे। वहां ठंडा वातावरण रहता था। पेड़ों की छांव में खेलते थे। लेकिन अब हमारी पूरी जिंदगी बदल गई।”

“मैं बहुत अकेला हो गया हूं। में घर में यहां आने के बाद बीमारी से पांच मौतें हो गयी हैं। जो पैसा था सब खत्म हो गया। घर में जो जेवर गहने थे वे भी बिक गये। घर में खाने केा नहंी है तो इलाज कहां से करवाएं?”

“हमें जंगल में बेरोकटोक घूमना अच्छा लगता है। वहां की हरियाली भाती है, वहां अपनी सहेलियों के साथ जंगल जाना अच्छा लगता है। वहां आजादी है, अपनी जिंदगी में किसी का दखल नहीं है। अब हमें पता नहीं नई जगह पर यह सब मिलेगा या नहीं ?”

इन जैसे दर्जनों बयान हों या शीर्षक उपशीर्षकों में बंटी किताब कें कथन हों जैसे- उजड़े-उखड़े गांव- एक शिक्षक कैसे पढाएगा पांच कक्षाओं को। नीमघान- अमीरों का सैर-सपाटा आदिवासियों के जीवन में अंधेरा। इंदिरा नगर- न वे ढोल हैं, न वह मस्ती हैं। तवा के मछुआरे- मालिक से वापस चोर, छींदापानी- विस्फोटों से उखड़ते जीवन के परखच्चे, गाजनिया बेड़ा- पहले महुआ खाते थे, वह भी छिन गया, विस्थापन के डर से सहमी है जंगल की बेटियां। न बिजली न डीजल फिर भी होती है सिंचाई। ये शीर्षक अपने में ही एक पूरा वक्तव्य भी हैं, पढने वालों को सहज ही उन संवेदनाओं से जोड़ने में मदद करते हैं।
किताब को सहयोग देकर पढ़ने को लिया जाये तो लेखक को मदद भी मिलेगी और हिम्मत भी।

वीरेन्द्र दुबे, पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों में बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री के निर्माण में सक्रिय भूमिका। जंगल पहाड़ और वहां रहने वाले लोगों से गहरा जुड़ाव।

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3 Responses to "’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया"

सुन्दर पुस्तक से परिचय कराया, इसके लिए धन्यवाद, क्या इसका ई-संस्करण उपलब्ध करा सकते हैं।
कुछ बाते ह्रदय को छू गई

वीरेन्द्र भाई ने पुस्तक की जान पेश कर दी है । उम्मीद है कि उनसे बाबा ’जुगनू’ के लिए सतत कुछ न कुछ हासिल करते रहेंगे ।

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