Juggnu | जुगनू

जलवायु परिवर्तन के दौर में बाबा आमटे की याद

Posted on: जनवरी 3, 2010

हाल ही में खबर आई कि नर्मदा घाटी में बाबा आमटे को याद किया गया। मौका था बाबा की जन्मदिन की वर्षगांठ का। बड़वानी जिले की कसरावद में किसानों, आदिवासियों और मछुआरों ने बाबा के आंदोलन व संघर्ष में योगदान

बाबा आमटे

 का स्मरण किया। इस मौके पर ग्रामीणों के अलावा आंदोलन के सक्रिय साथी रहमत भाई और मेधा पाटकर भी थे। बाबा के चित्र पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरूआत की गई। इस अवसर पर आंदोलन के लिए समर्पित रहे पत्रकार साथी संजय संगवई को भी याद किया गया।

उन्हें याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज जलवायु परिवर्तन पर बड़ा हल्ला हो रहा है लेकिन बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर जैसे लोगों ने इस खतरे को पहले ही भांप लिया था और इसके बारे में चेतावनी दे दी थी। लेकिन उसे हमने अनुसुना कर दिया और विकास की रट लगाए सीमित प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट करते रहे और पर्यावरण बिगाडते रहे। आज हालत यह हो गई है कि पर्यावरण का गहरा संकट आसन्न है। धरती का तापमान बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्रीय मछलियां मर रही हैं। समुद्र तट पर बसे देशों के जलमग्न होने का खतरा है।

बाबा यानी मुरलीधर देवीदास आमटे। यह बाबा का असली नाम था। उनका जन्म 26 दिसंबर 1914 में महाराष्ट्र के एक गांव में हुआ था। यद्यपि उनका ताल्लुक जमींदार परिवार से था लेकिन वे इतने संवेदनशील थे कि रास्ते में गिरे पड़े एक मृतप्राय कोढ़ी की दशा देखकर द्रवित हो गएं। उसकी न केवल उन्होंने मदद की बल्कि उनके जैसे कुष्ठ रोगियों की सेवा में बरसों जुटे रहे। अब बाबा हमारे बीच नहीं है। उनका 9 फरवरी, 2008 को निधन हो गया है। लेकिन आज भी उनके समाजसेवी दोनों बेटे, बहुएं और पोते उस को आगे बढ़ा रहे हैं।

बाबा ने अपने जीवन में रचना और संघर्ष के दोनों कामों को समान महत्व दिया और इसके लिए ठोस रूप में काम किया। उन्होंने जो कहा वह किया। उनकी कथनी-करनी एक थी। उनके रचना के कामों में आनंदवन है तो नर्मदा घाटी में चल रहा संघर्ष है। यह सब हमारे सामने है।

नर्मदा के किनारे

मध्यप्रदेश में नर्मदा तट के किनारे कसरावद में बाबा लगभग एक दशक तक रहे। उन्होंने नर्मदा घाटी में चल रहे बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन को संबल प्रदान किया। यद्यपि बाबा ने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत कोढ़ग्रस्त रोगियों की सेवा से की लेकिन वे हमेषा शारीरिक कोढ़ से ज्यादा खतरनाक मानसिक कोढ़ को मानते थे। वे मानते थे कि देश मानसिक रूप से कोढ़ग्रस्त है। वे इसके खिलाफ लगातार चेतना जगाने-फैलाने की कोशिश करते रहे।

इसके लिए उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा भी की। उन्होंने बड़े बांधों के बारे में न केवल सवाल उठाया बल्कि उनके खिलाफ संघर्ष में कूदे भी। विकास की पूरी अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर दिए। वे अपने नाजुक स्वास्थ्य के बावजूद करीब एक दशक तक नर्मदा के किनारे रह कर सबके प्रेरणास्त्रोत बने रहे। यह स्थान संघर्ष का प्रतीक बन गया। नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान ही मुझे उन्हें देखने-सुनने का मौका मिला।

पहली बार मैंने बाबा आमटे को मैंने हरसूद के संकल्प मेले में देखा। मध्यप्रदेश के खंडवा के पास हरसूद में 28 सितबर, 1989 को बड़े बांध के खिलाफ संकल्प मेला आयोजित हुआ था। इस मेले में करीब 40 हजार लोग जुटे थे जिसमें ’बांध नहीं बनेगा, कोई नहीं हटेगा’ का नारा गूंजा था। यहां सिने तारिका शबाना आजमी भी आई थीं। और कर्नाटक के प्रख्यात साहित्यकार व पर्यावरणविद् शिवराम कारंत भी शामिल हुए थे। यहां आए लोगों ने मौजूदा विकास के बारे में सवाल उठाए थे और उसकी निरर्थकता बताई थी।

बाबा वहां मंच पर लेटे हुए अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेर रहे थे और सबके आकर्षण के केंद्र बने हुए थे। यहां कलागुरू विष्णु चिंचालकर ने एक स्तंभ भी बनाया था। अब हरसूद भी डूब गया है और वह स्तंभ भी। पर वे सवाल आज भी खड़े है, जो उस समय उठाए गए थे। हमें कैसा विकास चाहिए? इस मेले में संकल्प लिया गया था कि हम विनाशकारी विकास की योजनाएं नहीं चलने देंगे।

नर्मदा घाटी में बाबा को देखने-सुनने के और भी मौके आए। उस समय में इंदौर में कानून की पढ़ाई कर रहा था और नईदुनिया में अंशकालिक काम भी कर रहा था। एक बार तो मैं 15 दिनों तक पदयात्रा में शामिल रहा। बहुत ही उत्साहजनक वातावरण था। यहां मैंने देखा बाबा के आसपास ही महत्वपूर्ण लोगों का जमघट लगा रहता है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बाबा की राय जरूरी समझी जाती थी। मीडिया तो हमेशा ही उन्हें घेरे रहता था। लोगों के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और चिंता होती थी।

एक बार किसी स्थान पर सभा शाम को देर तक खिंचने लगी तो बाबा ने कहा- ’अब बस करो, भूखे पेट के कान नहीं होते।’ ऐसा वे ही कह सकते थे। उन्होंने बरसों तक कोढी रोगियों की सेवा में बिताए थे। उन्हें समाज में स्वाभिमान व सम्मान का दर्जा दिलाया। वे जो भी करते थे समर्पित भाव से ही करते थे।

बाबा कठोर संकल्प वाले व्यक्ति थे। उनकी संकल्पशक्ति का लोहा देश-दुनिया मानती है। आनंदवन व हेमलकसा इसका जीता-जागता उदाहरण है। वे बहुत भावुक इंसान थे। एक बार किसी व्यक्ति को आनंदवन में गुलाब का कांटा लग गया था तो लहूलुहान हो गया। बाबा ने कांटे वाले गुलाब की जगह कांटारहित गुलाब का पौधा तलाश किया, जो उन्हें किसी मित्र ने ढूंढकर लाकर दिया।

बड़वानी के पास राजघाट से शुरू हुई यात्रा में बहुत उत्साह था। गीत-गाने और नारों के साथ पदयात्रा आगे बढ़ रही थी। इसमें निमाड़-मालवा के 5 सौ से ज्यादा लोग होंगे। लोग खाने की सामग्री व बिस्तर अपने साथ लेकर चल रहे थे। बड़ी संख्या में शहरों से आए युवक-युवतियां शामिल थे। उनके खाने-पीने की जिम्मेदारी गांवों के लोगों की थी। हर गांव के साथ कुछ लोगों की टीम कर दी गई थी, जो उनके साथ ही खाती-पीती थी।

गुजरात की सीमा पर स्थित फेरकुआं में गुजरात सरकार ने पदयात्रा को रोक दिया। दमन भी हुआ था। गुजरात की सीमा में जाने वाले जत्थों को मारा-पीटा गया था। आंदोलनकारियों ने कई दिनों तक खुले आसमान के नीचे कड़कड़ाती ठंड में रातें गुजारीं। बाबा ने दमन के खिलाफ धरना दिया। वे कहते थे विनाश नहीं, विकास चाहिए।

बाबा ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई युवकों को प्रभावित किया जिनमें से आज विविध तरह के सामाजिक काम में जुटे हैं। आजकलं छत्तीसगढ़ में कार्यरत जेकब नेल्लीथानम बरसों से कृषि की परंपरागत पद्धतियों पर काम कर रहे हैं। वे बाबा के साथ भारत जोड़ो अभियान में केरल से ही साइकिल से आए थे। हिमांशु ठक्कर जल विशेषज्ञ हैं। समाज प्रगति सहयोग बागली(मध्यप्रदेश) में बाबा की प्रेरणा से ही अपना काम आगे बढ़ा रहा है। यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है। कुछ लोगों का नाम छूट भी सकते है। लेकिन यहां मकसद यह नहीं है। यानी बाबा के कामों और विचारों से अनेक लोगों ने प्रेरणा प्राप्त की और आज भी कर रहे हैं।

बाबा गांधी के सच्चे अनुयायी थे। आज जब दुनिया गांधी के रास्ते की ओर देख रही है, तब उनकी याद आना स्वाभाविक है। मौजूदा विकास की नीतियों व पद्धतियों ने दुनिया के अमीर देश अमरीका व यूरोप में प्रदूषण का स्तर बढ़ा लिया है। जहरीली गैसों से अपने देशों को घेर लिया है। वे अब तीसरी दुनिया की ओर देख रहे हैं। अपना प्रदूषण कम नहीं कर रहे हैं पर तीसरी दुनिया पर कम करने के लिए दबाव डाल रहे हैं।

आज का पर्यावरण का संकट भी भोगवादी जीवनशेली की देन है। अपने ऐसी जीवनशॆली को अपनाया है जिसकी परिणति सामने है। अब हमे प्राकृतिक संसाधनों जल, जंगल, जमीन को बचाने की ओर बढ़ना चाहिए। यह प्राकृतिक संसाधन हमारे ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के भी हैं। यही बाबा भी अपने शब्दों में कहते थे। बाबा की सोच व काम हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।

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4 Responses to "जलवायु परिवर्तन के दौर में बाबा आमटे की याद"

‘जुगनू’ की शुरुआत के लिए बधाई ।
बाबा आमटे की स्मृति को प्रणाम । तम्बू में बाबा के साथ गुजारी हुई रात का विवरण नहीं दिया !

Bahut achha. Blog par lagatar aap likhte rahrngr aisi aasha hai. Baba Amte par achha lekh.

इस नए वर्ष में नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आशा है आप यहां नियमित लिखते हुए इस दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होंगे .. आपके और आपके परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

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