Juggnu | जुगनू

कृष्णमूर्ति

मूर्ति जी नही रहे, यह खबर सुनकर विश्वास नहीं हुआ। हालांकि उनके अस्वस्थ होने की खबर कुछ दिन पहले लग चुकी थी। 10 फरवरी को उनका असमय निधन हो गया। वे 47 वरष के थे। मूर्ति जी यानी डा, कृष्णमूर्ति सिंह रघुवंशी। वे अपने मित्रों व प्रशंसकों के बीचं मूर्ति जी के ही नाम से जाने जाते थे। वे पिपरिया से निकल कर नौकरी के सिलसिले में कई जगह रहे।

पवारखेड़ा, जबलपुर और वर्तमान में जवाहर लाल कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत पन्ना में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक के रूप में पदस्थ थे। लेकिन उनकी जो छवि मेरे मानस पटल पर अंकित है, वह है उनका गहरा सामाजिक सरोकार। ग्रामीण जनजीवन और लोकसंस्कृति में रचा-बसा ठेठ देशज अंदाज।

बरसों बाद हाल ही मेरी उनसे मुलाकाल हुई थी। कार्तिक पूर्णिमा पर सांडिया मेले हम साथ गए थे। लंबे अरसे तक मेरे क्षेत्र से बाहर रहने के कारण उनसे संपर्क टूट गया था। लेकिन पिछले साल जब मैंने साथी राजनारायण पर संस्मरण लिखा तो उन्होंने भी न केवल पढ़ा बल्कि ब्लॉग पर प्रतिक्रिया दर्ज की। इसके बाद संवाद का सिलसिला शुरु हो गया।

सांडिया मेले में हम साथ-साथ घूमे। गोपाल राठी, उनकी पत्नी श्यामा जी, श्रीगोपाल गांगूड़ा, कैलाश सराठे आदि के साथ मैं पूरे दिन उनके साथ रहा। अलग-अलग विषयों पर काफी बातचीत हुईं। ग्रामीणों को बड़ी संख्या को मेले में देखकर वे रोमांचित व उत्साहित हो रहे थे। ग्रामीण जनजीवन के प्रति उनका गहरा जुड़ाव छलक रहा था। सारंगी बजा रहे साधु को देखकर हम रूक गए। मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। मैं उनका साथ पाकर इस बात से अभिभूत था कि अपने विषयों के अलावा उनकी विविध मुद्दों में रूचि है। नर्मदांचल के लोकरंग, ग्रामीण जनजीवन,कला और संस्कृति से उनका विशेष लगाव है।

आल्हा और रामायण पर की तर्ज पर उन्होंने अपने दो वरिष्ठ साथियों नरेन्द्र मौर्य और वीरेन्द्र दुबे के साथ मिलकर बुधनी की आल्हा और जंगल रामायण की रचना की। यह साझा प्रयास था, जो कला-संस्कृति के विकास का भी इतिहास रहा है। इस क्षेत्र में चल रहे किसान-मजदूरों की हक और इज्जत की लड़ाई लड़ने वाले समता संगठन, समाजवादी जनपरिषद और किसान मजदूर संगठन में यह नया सांस्कृतिक आयाम था।

प्रख्यात समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने इस प्रयास की सराहना की। बुधनी की आल्हा पर तो शिक्षाविद् कृष्ण कुमार और वरिष्ठ पत्रकार व कवियत्री सुश्री वसंता सूर्या ने लेख भी लिखे। सराहना की। मूर्ति जी ने आल्हा का अपनी आवाज में गायन किया जिसकी कैसेट काफी लोकप्रिय हुई। गोपाल राठी ने इस पूरे प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे इसकी धुरी बने रहे।

गोपाल राठी के साथ

वीरेन्द्र जी के अनुसार मूर्ति की आवाज अलग थी। उसे भीड़ में भी पहचाना जा सकता था। मधुर और अपनी ओर खींचने वाली चुंबकीय आवाज थी। वह आवाज कानों में गूंजती थी। गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर मूर्ति जी ने स्वतंत्र लेखन भी किया। उनकी कई रिर्पोटस स्थानीय अखबार कर्मपुत्र के साथ अन्य जगह भी प्रकाशित होती रही हैं। वे विद्यार्थी जीवन से ही समता युवजन सभा, समता संगठन की गतिविधियों से जुड गए थे। उनका यह जुड़ाव अंत तक बना रहा।

शहीद भगतसिंह पुस्तकालय के वे नियमित पाठकों में से रहे हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थी। शहर के सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। उनके मित्र और शुभचिंतकों और चाहने वालों का दायरा बहुत बड़ा है। उनकी दुनिया बड़ी थी। वे बहुत ही आत्मीय, खुले और जिंदादिल इंसान थे। उनमें एक ठेठ देशजपन समाया हुआ था।

इस दौरे में उनके साथ मिलकर खेती-किसानी पर भी बात हुई। किसानों पर मंडराते अभूतपूर्व संकट से वे अवगत थे। उन्होंने कहा था हम इस पर साथ काम करेंगे। मैं उत्साहित था। लेकिन अब यह नहीं हो पाएगा। बहरहाल, उनकी स्मृति सदैव रहेगी। मूर्ति जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

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प्रेम मनमौजी

हाल ही में मेरी मुलाकात प्रेम मनमौजी से हुई, जो उज्जैन से पिपरिया में एक बाल मेले में आए थे। उनसे पहले भी मिल चुका हूं, पर इस बार अरसे बाद मिला तो बहुत प्रसन्नता हुई। और यह तब और बढ़ गई जब उनकी कलाकृतियों से रू-ब-रू हुआ। उन्होंने पेड़ की सूखी पत्तियों से चिड़िया, चूहा, बिल्ली, शेर, घोड़ा, हाथी गाय आदि आकृतियां बनाई हुई थी। कागज को काटकर खरगोश, शेर, गाय, भैंस और मनुष्य के मुखौटे बनाए हुए थे जिनमें रंगीन पेसिल से रंग भरे हुए थे, जो बहुत सुंदर लग रहे थे। मैं देर तक निहारता रहा। उनकी कलाकृतियों को देखकर मुझे कला गुरू विष्णु चिंचालकर की याद आ गई जिन्हें प्रेम भी अपना गुरू मानते हैं।

गुरूजी प्रकृति को अपना गुरू मानते थे। वे कहते थे प्रकृति ही कलाकार का सबसे बड़ा शिक्षक है। उसमें ढेरों आकृतियां और सौंदर्य छुपा है, जिसे कलाकार को पहचानकर उसके अनुरूप ही चित्रों को आकार देना है। यही काम बखूबी प्रेम मनमौजी कर रहे हैं।

प्रेम बचपन से मूर्तियां बनाने के शौकीन थे। उन्हें अपनी कला को निखारने और आगे बढ़ाने का मौका एकलव्य संस्था में आकर मिला। यह संस्था शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 30 वर्षो से कार्यरत है। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम एकलव्य की ही देन थी, जिसकी सराहना देश-विदेश में काफी हुई।

उन्होंने साफ-सफाई के काम से संस्था में शुरूआत की। लेकिन जल्द ही उनकी प्रतिभा को संस्था को पहचान मिली और उनकी रूचि व लगन के अनुसारं वे कला और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ गए। बाद में भी संस्था ने उन्हें काफी मौके उपलब्ध कराए। असल में एकलव्य का काम ही अलग-अलग तरह की प्रतिभाओं को सामने लाना और आगे बढ़ाना है। बच्चों की पत्रिका चकमक ने कई लेखक और चित्रकार तैयार किए हैं।

प्रेम के अंदर का सुप्त कलाकार तब अच्छी तरह जागा और सक्रिय हुआ, जब वे वर्ष 1985 में गुरूजी (विष्णु चिंचालकर) से मिले। देवास के पास हाटपीपल्या में एकलव्य के कार्यक्रम में गुरूजी आए हुए थे। वहां गुरूजी ने बहुत ही मामूली चीजों से बहुत ही आकर्षक और सुंदर कलाकृतियां बनाई।

मुझे खुद गुरूजी ने इंदौर के संवाद नगर स्थित घर में ऐसी ढेर चीजें दिखाई थीं। सुपारी से गणेशजी, आम की गुठली से टैगोर और टूटी चप्पल की मोनालिसा की याद अब भी है। हिन्दी और अंग्रेजी के अक्षरों से विभिन्न तरह की आकृतियां बनाई थी। गुरूजी अक्षरों से खेलते थे और उनसे विभिन्न तरह के चित्र बनाते रहते थे। उनकी इस परिकल्पना के आधार पर कई और लोगों ने ऐसे प्रयोग किए हैं।

गुरूजी की इसी विधा को प्रेम मनमौजी ने अपनाया। बहुत ही कम संसाधनों में कला को बेहतर रूप दिया। उनका कहना है कि अगर हम केवल पत्तियों से आकृतियां बनाने की बात करें तो पेड़ों से गिरी हुई पुरानी पत्तियों को एकत्र करें। पेड़ों से ताजी पत्तियां न तोडे। पुरानी पत्तियों में कुछ अलग-अलग रंग भी मिल जाते हैं, जो कि ताजी पत्तियों में नहीं मिलते।

प्रेम कहते हैं कि सबसे पहले पत्तियों को गौर से देखें-उनमें कौन सी आकृति छुपी है। उसकी कल्पना करें और फिर उसे उसके अनुरूप उसे आकार दें। चित्र की कल्पना हरेक बच्चे की अलग-अलग हो सकती है। इनसे उल्लू, मेंढ़क, गौरेया, चूहा, बिल्ली कुछ भी बनाया जा सकता है।

प्रेम मनमौजी की पत्तियों के रचना संसार पर एक किताब भी आ चुकी है। इस किताब का विमोचन वर्ष  1997 मे खुद गुरूजी ने किया था। कई जगह कला प्रदर्शनी लग चुकी हैं। उन्हें अखिल भारतीय कालिदास कला प्रदर्शनी सम्मान मिल चुका है। उनकी कला पर देश-प्रदेश की पत्र-पत्रिकाओं में छप चुका है।

वे न केवल पत्तियों से आकृतियां बनाते हैं बल्कि काष्ठ और मिट्टी से भी बनाते हैं। इसके अलावा जादू दिखाते हैं। कागज की कई आकृतियां बनाते हैं। चूंकि वे उज्जैन में रहते हैं। उज्जैन की कला और संस्कृति के क्षेत्र में समृद्ध परंपरा रही है। इसका निशिचत ही उनकी कला पर प्रभाव दिखता है। इस ओर बच्चे भी प्रयास करें तो उन्हें भी मजा आएगा और अगर चित्रों के बारे में लिखें तो भाषा और लेखन क्षमता भी बढ़ेगी। स्कूल के बाहर ऐसी गतिविधियों से शिक्षण बहुत ही उपयोगी होगा।

सुरेन्द्र मोहन

सुरेन्द्र जी नहीं रहे, यह खबर फोन पर गोपाल भाई ने दी। मैं फोन पर उनसे ज्यादा बात न कर सका। मानस पटल पर एक के बाद एक कई छवियां उभरती – मिटती गईं। इसलिए नहीं कि मुझे उनका कुछ समय सानिध्य और वात्सल्यवत् स्नेह मिला। बल्कि इसलिए भी कि वे ईमानदार, सादगी पसंद, सहज-सरल और सैद्धांतिक निष्ठा वाले समाजवादी राजनैतिक कार्यकर्ता थे, जिनकी आज राजनीति में कमी दिखाई देती है।

सफेद-कुर्ता पायजामा, लंबी कद-काठी, चेहरे पर चष्मा और ओठों पर चिर-परिचित मुस्कान, यही सुरेन्द्र जी पहचान थी। न कोई तामझाम और न कोई औपचारिकता। वे सहज उपलब्ध थे। खासतौर से आज जब बड़े लोगों से बिना अनुमति मिल नहीं सकते, तब सुरेंद्र जी का न केवल सानिघ्य पा सकते थे बल्कि उनसे बात भी कर सकते थे।

वे आजादी की लड़ाई के सहयात्री रहे। एक-दो साल काशी विद्यापीठ में पढ़ाने के बाद फिर समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता बन गए। हालांकि फिर भी उनका पढ़ाई-लिखाई से आजीवन रिश्ता बना रहा। वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लगातार लिखते रहे। उनके लेख देश भर के हिंदी-अंग्रेजी अखबारो में छपते रहे। उनके लेखों में सदैव हाशिये के लोगों की चिंता होती थी, जो प्रायः आज मीडिया में नहीं दिखाई देती।

सत्ता के एकदम करीब रहकर भी उससे दूर बने रहे। जयप्रकाश नारायण से लेकर राममनोहर लोहिया के साथी रहे। आपातकाल में जेल भी काटी। जनता पार्टी के महासचिव रहे। बाद में राज्यसभा सांसद भी रहे। वे अपने अंतिम समय ८४ वर्श तक मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय रहे। और मृत्यु के एक दिन पूर्व तक एक धरने में शामिल हुए।

सुरेन्द्र जी बहुत ही सहज-सरल व्यक्ति थे। इसका यहां एक उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा कि जब मैं वर्श 2004 में दिल्ली के उनके ही अपार्टमेंट सहविकास में किराये से रहने लगा और इसका पता उन्हें चला तो वे खुद ही मिलने चले आए। फिर तो कई बार मुलाकातें हुईं। उनकी पत्नी मंजू मोहन जी का भी स्नेह मिला। और वे सदैव हमारा ध्यान रखती थीं।

लेकिन उनका यह स्नेह केवल मुझ से ही हो, ऐसा नहीं है बल्कि हर उस जमीनी कार्यकर्ताओं से उनका गहरा लगाव था, स्नेह था, जो जन सरोकारों से जुड़े हुए थे। देश भर में अलग-अलग समूहों से जुड़े लोग उनसे मिलने आते रहते थे। सुरेन्द्र जी के पास हर ऐसे लोगों को समय भी था। उम्मीद थी। प्रोत्साहन था। इसका एक उदाहरण देना अनुचित न होगा कि होशंगाबाद जिले में समता संगठन के उम्मीदवार श्रीगोपाल गांगूड़ा के समर्थन में वे समय निकालकर चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे। शायद इसलिए कि वे चाहते थे राजनीति में नीचे से बदलाव हो।

मुझे जो चीज सबसे प्रभावित करती है वह उनकी ईमानदारी और सैद्धांतिक निष्ठा। आज राजनीति में सिद्धांतों और मूल्यों को अयोग्यता के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन सुरेन्द्र जी, किशन पटनायक जैसे लोगों को देखकर राजनीति में संभावनाएं नजर आती हैं। और इसमें ही लोकतंत्र का भविश्य उज्जवल हो सकता है। लोकतंत्र में ही यह करिश्मा है कि समाज के निचले स्तर का आदमी शिखर पर पहुंच सकता है।

हमारे देश में हर बड़े व्यक्तित्व को महान और संत बनाने की परंपरा है। सुरेंद्र जी स्वभाव और जीवनशॆली में भले ही संत और महात्मा जैसे लगते हों, लेकिन वे सही मायनों में एक ईमानदार, सादगी पसंग, सरल और सच्चे समाजवादी थे।

राजनारायण

वर्ष 1989 की बात है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को चिट्‌ठी लिखकर इस क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराया था। इस चिट्‌ठी ने देश का ध्यान इस अंचल के आदिवासियों की समस्याओं की ओर खींचा। केसला विकासखंड आदिवासी बाहुल्य है और यहां कई परियोजनाओं से आदिवासी उजड़े हैं। यह चिट्‌ठी उन्होंने जेल से लिखी थी। इन कार्यकर्ताओं का कसूर यह था कि उन्होंने आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई में साथ दिया था। जिन दो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिट्‌ठी लिखी थी उनमें से एक राजनारायण था जिसका एक सड क हादसे में 26 अप्रैल 1990 को निधन हो गया। उसकी 20 वीं पुण्यतिथि है।

राजनारायण के बारे में जब मैं सोचता हूं तो मेरे स्मृति पटल पर उसकी कई छवियां उभर आती हैं। दुबला-पतला, दाढी और चश्मा वाला तेजतर्रार आदर्शवादी युवक। शांत और मिलनसार मित्र। अभाव और मुशिकलों में अडिग रहना वाला कार्यकर्ता। जंगल और पहाड़ में रहने वाले आदिवासियों का सच्चा हमदर्द। अन्याय के खिलाफ हाथ उठाकर जोशीले नारे लगाने वाला साथी। धरना और जुलूस में ठेठ लोक शेली में मस्ती से गीत गाने वाला समाजवादी।

आज जब नई पीढी प्रतियोगिताओं को पार कर इस व्यवस्था में अपने भविष्य की तलाश कर रही है तब कुछ बरस पहले इटारसी का एक युवक सब कुछ छोड कर समाजवादी सपने को साकार करने के लिए जंगल के बीच अकेला ही रहने लगा, यह कुछ अजीब सा लगता है। राजनारायण ही वह युवक था। 80 के दशक में कुछ समाजवादियों के संपर्क में आने के बाद वह आदिवासी बहुल विकासखंड केसला के पास बांसलाखेडा ( सहेली ) में रहने लगा था। यहां विखयात समाजवादियों ने लोहिया अकादमी नामक समिति बनाई थी जिसमें 50 एकड से ज्यादा जमीन थी।

राजनारायण इटारसी के एक शिक्षक का बेटा था। बी. कॉम की पढ़ाई बीच में ही छोड कर ही उसका समाजवादी विचारों की तरफ रूझान बढा। वह पहले युवा जनता में शामिल था और वह यह समझ गया कि मौजूदा राजनैतिक दल आम जनता की समस्याओं को हल करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच मैदानी काम करना जरूरी है। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक व समाजवाद के संपर्क में आया और उनके मार्गदर्शन में आदिवासी और किसानों को संगठित करने में लग गया। समता संगठन से जुड गया, जो मुखयधारा की राजनीति से अलग समाजवादी विचारों का एक राजनैतिक संगठन था। 1995 में यह समाजवादी जनपरिषद नामक राजनैतिक दल में समाहित हो गया। आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई को आगे बढाने के लिए स्थानीय स्तर पर वर्ष 1985 में किसान आदिवासी संगठन नामक संगठन बनाया था।

इधर पिपरिया में भी गोपाल राठी जैसे समाजवादी युवकों से राजनारायण की मित्रता थी जो समय-समय पर उसे मदद करते थे। जब कभी राजनारायण को अपने कामों से अवकाश मिलता, वह पिपरिया के साथियों से आकर जरूर मिलता था। धीरे-धीरे केसला के आदिवासियों के दुख-दर्द अब बाहर आने लगे थे। बाद में जवाहरलाल विश्वविद्यालय की पढ़ाई अधूरी छोड कर सुनील भी राजनारायण के साथ मिलकर आदिवासियों की हक और इज्जत की लडाई में शामिल हो गए। बाद में उनकी पत्नी स्मिता भी आ गईं। आलोक सागर और सुरेन्द्र झा भी टीम में शामिल हो गए। इसके बाद तो धरना, जुलूस, पदयात्राओं का सिलसिला शुरू हो गया।

केसला, इटारसी, होशंगाबाद और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल तक आदिवासी गए। भोपाल से बैतूल की सडक जुलूस और रैलियों की गवाह बनी। यहां आदिवासियों का तथाकथित विकास के लिए कई बार विस्थापन की पीडा से गुजरना पडा है। तवा बांध, प्रूफरेंज, आर्डिनेंस फैक्टी विस्थापन हुआ। उजडे-उखडे लोगों को न मुआवजा मिला और न ही जमीन। और जो थोडा बहुत मुआवजा मिला भी तो वह इतना कम था कि वह विस्थापितों के मजाक ही कहा जाएगा।

इटारसी के आगे बागदेव के पुल के इस तरफ की दुनिया और उस तरफ जंगल में आदिवासियों की दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर है। इस तरफ जंगल से डर कर भागने वाले लोग थे और दूसरी तरफ जंगल में ही रहने वाले लोग थे। एक तरफ भोगवादी जीवन के आदी लोग थे दूसरी प्रकृति के साथ

सबसे कम संसाधनों में जिंदा रहने वाले लोग थे जिनसे उनके ये प्राकृतिक संसाधन छीनने की कोशिश की जा रही थी। राजनारायण ने इन्हीं गोंड-कोरकू आदिवासियों की

आवाज को बुलंद किया। जो गोंड-कोरकू आदिवासी शर्ट-पेंट पहने आदमी को देखकर सहम जाते थे। वे सड़क पर अपने हकों के लिए खडे होने लगे।

वर्ष 1985 के आसपास मैं बांसलाखेडा पहली बार गया था और एक महीने रहा था। हरे-भरे जंगल के बीच नदी किनारे का यह स्थान बहुत ही रमणीक था। राजनारायण अपने मां-बाप के साथ रहते थे। सुनील जी उसी समय दिल्ली से यहां आए थे। सुनील जी और राजनारायण के साथ कई गांवों में घूमा। एक माह बाद पानी के लिए होशंगाबाद तक पदयात्रा हुई। जब पदयात्रा पथरौटा पहुंची तब राजनारायण ने वहां साइकिल रिक्शे पर बैठकर माइक से लोगों को संबोधित किया। वह जोश से भरा चेहरा मेरे आंखों के सामने तैर रहा है।

वह जनता के साथ एकाकार हो गया था। गांव-गांव घूमना, लोगों के साथ उठना-बैठना। उनके दुख-तकलीफों को सुनना-समझना और उन्हें संगठित करना, उसका काम था। वह गांव जाकर आने के लिए उतावला नहीं होता था। वह वहां रूकता था, खाता-पीता था और लोगों के साथ बैठकें करता था। बाद में उसने जो आंदोलन के बीज बोए वह बैतूल, सिवनी-मालवा और बनखेड़ी-पिपरिया तक पहुंच गए।

राजनारायण

मुझ जैसे राजनारायण के मित्र हैं, जिन्हें वह उम्मीद की किरण था। अब राजनारायण नहीं है। सुनील जी हैं, उन्हें तो लोग कई बार राजनारायण ही समझते हैं। कद-काठी और दाढी-चशमे के कारण सुनील और राजनारायण में फर्क करना मुद्गिकल है। राजनारायण की याद में एक नारा लगाया जाता था कि साथी तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएंगे, यह सफर जारी है। साहित्यकार

कश्मीर उप्पल ने लिखा है कि यह मसीहा पहाडी पर एक तेज आंख की तरह हमें देखता रहेगा

और राह भी दिखाएगा। ऐसे सच्चे, आदर्शवादी समाजवादी मित्र के व्यक्तित्व से सीखकर हम कुछ कर पाएं तो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-बाबा मायाराम

                                                       

मैं सतपुड़ा अंचल में जिन लोगों से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, उनमें से एक हैं गोपाल राठी। इसलिए नहीं कि वे मेरे भ्रातृतुल्य स्नेही मित्र हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे गत ३० बरसों से इस अंचल के किसान, आदिवासियों और दलितों के संघर्ष में शामिल रहे हैं। वे न केवल इनमें खुद मौजूद रहते हैं, बल्कि इसमें दूसरों को भी जोडने का प्रयास करते हैं। वे इनमें इतने गहरे रचे-बसे हैं कि उनकी बातचीत का मुद्‌दा सदैव ऐसे ही विषय रहते हैं जिनका लोगों से सीधा सरोकार हो।

जब मैं उनके बारे में सोचता हूं तब मुझे उनका ऊर्जा से ओत-प्रोत चेहरा सामने आता है। उनमें नीरस व निराशा के माहौल को सहज और हल्का बनाने की कला है। नौजवानों व मित्रों का जोशीले अंदाज में उत्साह बढाना, उनकी विशोषता कही जा सकती है। संचार क्रांति के इस दौर में उनके मोबाईल की घंटी फुरसत के क्षणों को कुछ अर्थ देती हो या न देती हो, भीड में अकेलेपन के सन्नाटे को जरूर तोड ती है। कभी हम उनकी बेकरारी से खीझते भी हैं, लेकिन फिर समझ आता है कि इसमें उनकी कुछ गुजरने की तडप है।

जब वे जन आंदोलनों में माइक पकडते हैं, तो एक अलग समां बंध जाता है। जब वे मौजूद रहते हैं तब सभा या कार्यक्रम का संचालन कोई और करे, शायद ही ऐसा देखा गया है। इसका एक कारण तो उनका लोगों के प्रति गहरा समर्पण है, दूसरा वाकपटुता और लोगों से सीधा साक्षात्कार करने की उनकी चाहत भी है। मुद्‌दों की समझ तो है ही।

मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे में वे निवास करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एकलव्य के साथ काम करते हुए भी वे हमेशा अंचल के जन सरोकारों से तो जुड़े ही रहते हैं। प्रदेश स्तर पर जन संगठनों के साथ भी उनका रिशता बना हुआ है।

करीब २०-३० साल पहले उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ पिपरिया में समता अध्ययन केन्द्र की द्यशुरूआत की थी। सांडिया रोड पर एक छोटे से कमरे में एक पुस्तकालय चलता था जिसमें अधिकांश पुस्तकें अपने मित्रों व सहानुभूति रखने वाले लोगों से एकत्र की गई थी। पुस्तकालय में साहित्यिक किताबें तो थी, राजनीतिक विचारों की किताबें थी। जिनमें मार्क्स, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश, विवेकानंद, भगतसिंह और समाजवादी साहित्य उपलब्ध था। यहां बडी संखया में युवजन एकत्रित होते थे।

दिनमान में समाजवादी चिंतक किशन पटनायक का लेख पढ कर गोपाल भाई ने पत्र लिखा था और किशन जी ने उस पत्र के जवाब में उन्हें मिलने के लिए कहा था। यहां उन्होने समता संगठन की नींव डाली। बाद में बरसों तक किशन पटनायक का इस अंचल से करीबी रिशता बना और उन्होंने यहां के समाजवादी विचारों से प्रेरित जन संगठनों का मार्गदर्शन किया। चाहे केसला विकासखंड में आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई हो या बनखेडी क्षेत्र में किसान मजदूरों की। सभी जगह किशन पटनायक और सुनील सरीखी हस्तियां का नेतृत्व मिलता रहा। गोपाल भाई की इन सबमें महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है। उन्ही के प्रयास से श्रीगोपाल गांगूडा व हरगोविंद राय जैसे युवा भी समाजवादी विचारधारा से जुडे, जो सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहे।

ज्वलंत समस्याओं पर अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने यहां चौराहे पर बोर्ड रखने की शुरूआत की। स्थानीय झंडा चौराहे पर बोर्ड चर्चा व कौतूहल का विषय बनता रहा है। चाहे असम समस्या हो या बिहार प्रेस बिल, सांप्रदायिकता के खिलाफ मुहिम हो या किसान-आदिवासियों पर जुल्म। बोर्ड पर लिखी टिप्पणियां और नारे हमेशा चर्चा में रहे। समाजवादी राजनीति से गहरा जुड़ाव उनकी टिप्पणियों व नारों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। कई बार तो अखबारों ने भी बोर्ड के संदेश को प्रचारित-प्रसारित किया। यह वैकल्पिक मीडिया का भी एक प्रयोग माना जा सकता है। खासतौर से ऐसे समय में जब जन सरोकारों को मीडिया में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है।

उनका नई पीढी से खास लगाव है। वे मोबाईल व इंटरनेट के माध्यम से जुडे रहते हैं। इसके अलावा, एकलब्य पुस्तकालय में रोजाना करीब ४०-५० युवजन आते हैं। पुस्तकालय में कमलेश भार्गव का साथ है। यह पुस्तकालय गतिविधि केंद्र भी है, जहां समय-समय पर विभिन्न विषयों पर चर्चा गोच्च्ठी का आयोजन होता रहता है। यहां प्रखयात पत्रकार प्रभाष जोशी, शिक्षाविद्‌ अनिल सद्‌गोपाल, विनोद रायना, सुशील जोशी, विष्णु नागर जैसी हस्तियां आ चुकी हैं और उनकी वे सराहना प्राप्त कर चुके हैं। उनके बारे में लिखना का एक बहाना उनका जन्मदिन है, हालांकि वे जन्मदिन मनाने के पक्षधर नहीं है। उनका ५१ वां जन्मदिन है। सदैव नई ऊर्जा से अपने मिशन में लगे रहें, ऐसी कामना है।

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जब कभी भी मेरा पचमढ़ी जाना होता है। मोतीलाल जैन जी जरूर मिलता हूं। इस बार वे कुछ व्यथित दिखे। उनकी पीडा निजी नहीं, सार्वजनिक थी। कहने लगे हम पहले रोटी, कपडा और मकान, मांग रहा है हिन्दुस्तान, का नारा लगाया करते थे, यह आज भी प्रासंगिक है। आज भी हिन्दुस्तान की बुनियादी समस्याएं वहीं हैं, जो पहले थी। आज भी दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, अशिक्षित और बेघर लोग भारत में रहते हैं। देश के ३ वर्ष से छोटे बच्चों के लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं।

८४ साल के वयोवृद्ध मोतीलाल जी आजादी की लडाई के सिपाही तो थे ही, बाद भी लगातार सक्रिय रहे। समाजवादी सिद्धांतों में विशवास करने वाले मोतीलाल जी कहते हैं ”उनके कई साथी इधर-उधर चले गए लेकिन वे कहीं नहीं गए। क्योंकि समाजवाद से ही देश में बराबरी का समाज बन सकता है।” उनकी राजनीति में खासतौर से रचना के कामों में विशेष रूचि रही है और अब भी है।

सतपुडा की रानी पचमढ़ी देश-दुनिया में पर्यटन के लिए मशहूर है। यहां प्रकृति की अपनी ही निराली छटा है। सतपुडा की सबसे बडी चोटी धूपगढ , महादेव और कई मनोरम दृद्गय हैं। महादेव की चोटी पर्वतारोहियों के लिए बहुत आकर्षक है। ऐतिहासिक पांडव गुफाएं हैं, जिनके नाम पर इसका नाम पचमढ़ी पडा है। जंगल और पहाडों के बीच कल-कल झरनों को बहते अविराम देखते ही रहो। बहुत सुकून मिलता है। शंत और शोंरगुल से दूर। ऊंचे-ऊंचे पहाड वृक्षों और लताओं से ढके हुए। बहुत ही मनमोहक। सतपुडा की पर्वत श्रृंखला अमरकंटक से असीरगढ तक फैली हुई हैं। दक्षिण में सतपुडा के पर्वत नर्मदा नदी के समानांतर पूर्व से पशिचम की ओर चलते हैं।

मोतीलाल जी कर्मभूमि पचमढ़ी रही है। आजादी से पहले वे हस्तलिखित पत्रिका चिनगारी निकाला करते थे और उसे बारी-बारी से पढने को देते थे। उस समय कोई प्रेस तो था नहीं। समाचार पत्र भी सिर्फ दो आते थे कर्मवीर और विशवामित्र। लोगों को आजादी की लडाई की जानकारी देने के उद्‌देशय से चिनगारी शुरू की जिसमें अधिकांश खबरें समाचार पत्रों से ली जाती थी। एक महीने में यह पत्रिका ३० घरों में पढी जाती थी।

राजनैतिक चेतना जगाने के लिए उन्होंने जनता पुस्तकालय खोला। उनका मानना है कि जब तक आदमी पढेगा नहीं तब तक पूरी समझ नहीं बन पाएगी। इस पुस्तकालय में साहित्य के अलावा राजनैतिक पुस्तकें भी होती थीं। मनमथनाथ गुप्त, आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया आदि कई लेखकों व विचारकों की पुस्तकें थी। इसमें एक नियम यह था कि जो भी सदस्य बडे शहरों में किसी काम से जाए, वह वहां से पुस्तकें लेकर आए । इस तरह पांच सौ से ज्यादा पुस्तकें पुस्तकालय में हो गई थीं। मजदूरों को जोड ने के लिए मनोरंजन क्लब आदि चलाते थे, जहां राजनैतिक चर्चाएं होती थीं। वे अनपढ लोगों को पढाते थे।

वे शराबबंदी आंदोलन चलाते थे। जिस किसी के घर में कच्ची द्गाराब बनने की खबर मिलती, वहां पहुंचकर शराब बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाले मिट्‌टी के बर्तनों को तोड देते थे। इससे लोग स्वस्थ रहते थे और उनके पास कुछ पैसे भी होते थे। अन्यथा लोग अपनी कमाई शराब में गंवा देते थे तो घर में भोजन के लिए जरूरी सामग्री खरीदने के लिए पैसे भी नहीं होते थे। इसी प्रकार वे समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाते थे।

महाशिवरात्रि पर्व पर पचमढी में मेला लगता था। उसमें एक स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की टोली होती थी। उसमें मोतीलाल जी बढ -चढ कर हिस्सा लेते थे। व्यवस्था में मदद के लिए एक शिविर लगता था। कार्यकर्ताओं की लाल रंग की विशेष ड्रेस हुआ करती थी। हेलमेट सिर पर लगाते थे। यात्रियों और श्रद्धालुओं की व्यवस्था का पूरा खयाल रखा जाता था।

मोतीलाल जी बताते हैं समाजवादी पचमढ़ी में जनता थाना चलाते थे। इसका उद्‌देद्गय आपस के झगडो का आपसी सहमति से

मोतीलाल जैन

निपटारा करना होता था। यह बहुत सफल रहा। लोग इसमें अपनी शिकायत दर्ज कराते थे। दूसरे पक्ष को बुलाया जाता था और समझौता करने की कोशिश की जाती थी। वे कहते हैं उस दौरान थाने में दर्ज मामलों की संखया नगण्य हो गई थी। इस बात से पुलिस के आला अफसल आशचर्यचकित थे।

मोतीलाल जी को जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया सरीखे समाजवादी नेताओं का सानिध्य व स्नेह मिल चुका है। वे पचमढी समाजवादी अधिवेशन में भी रहे। और इस अधिवेशन के बाद लोहिया यहां दो माह तक रहे और उन्होंने यहां रहकर किताब एक लिखी। इस तरह समाजवाद से गहरा जुडाव हुआ और वे आज भी समाजवाद को ही लोगों की समस्याओं का समाधान मानते हैं।

वे याद करते हैं इस इलाके के १८५७ की लडाई में शामिल रहे भभूतसिंह को। वे कहते हैं अंग्रेज आदिवासियों से अंडा-मुर्गी मांगते थे। उनका अपमान करते थे। भभूतसिंह ने इसका डटकर विरोध किया। वह दिलेर आदमी था और सतपुडा की पहाडि यों से भलीभांति परिचित था। आदिवासियों का उसे पूरा समर्थन प्राप्त था। उसने अंग्रेजों को कडी टक्कर दी। तात्या टोपे ने भी उसमें सहयोग दिया। महीनों तक संघर्ष चला। लेकिन धोखे से उसे पकड लिया गया और बाद में जबलपुर जेल में उसे फांसी दे दी गई।

वयोवृद्ध मोतीलाल जी आज भी देश-दुनिया से बेखबर नहीं हैं। वे समाचार पत्र पढ़ते हैं, किताबें पढ ते हैं, देश-दुनिया की खबर लेते हैं। देश की गरीबी और भुखमरी से व्यथित है, परेशान हैं। लेकिन हमारे आज के गद्‌दी पर बैठने वाले लोग इससे बेखबर हैं। मोतीलाल जी से मिलकर सदा श्रद्धा व सम्मान से मन भर जाता है। पचमढी से लौटते समय मैं सोच रहा था राजनीति में अब ऐसे लोग क्यों नहीं आते?

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हाल ही में २० फरवरी को मेरा इंदौर जाना हुआ। मौका था- रावल जी यानी ओमप्रकाश रावल और महेन्द्र भाई यानी महेन्द्र कुमार की स्मृति कार्यक्रम का। रावल जी की यह १५ वीं पुण्यतिथि थी और महेन्द्र भाई की ७ वीं। दोनों में समानता यह है कि वे जन संगठनों के बड़े हिमायती थे और सामाजिक क्षेत्र में रूचि रखने वाले युवाओं की पीठ पर हाथ रख उन्हें आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसलिए आयोजकों ने भी दोनों विभूतियों का अनूठा संयुक्त कार्यक्रम का आयोजन किया। यह हर वर्ष होता है।

इन्दौर जब भी जाना होता है, मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। यह शहर मेरे लिए तीर्थस्थान की तरह है। जो कुछ सुंदर और अच्छा है उसे हम तीर्थस्थानों में खोजते हैं। इन्दौर का मेरे जीवन में खास महत्व है क्योंकि यहां ओमप्रकाश रावल, महेन्द्र भाई, गुरूजी यानी विष्णु चिंचालकर, काशीनाथ त्रिवेदी और राहुल बारपुते जैसी हस्तियां थी, जो अपने-अपने क्षेत्र में शिखर पर थे। श्रद्धा और सम्मान इसलिए भी ज्यादा होता है क्योंकि मुझे न केवल इन सबका सानिध्य प्राप्त हुआ बल्कि पुत्रवत स्नेह भी मिला।

साल में अलग-अलग विषयों पर होने वाले व्याखयान ने अब एक परंपरा का रूप ले लिया है। यह केवल रस्मी तौर पर नहीं, बल्कि जनजीवन से जुड़े ज्वलंत विचारों के आदान-प्रदान का मंच है। इस आयोजन से राकेश दीवान, चिन्मय मिश्र व सिद्धार्थ भाई जैसे विचारवान लोग जुडे हुए हैं। इस बार रावल जी के पुत्र असीम और उनकी पत्नी लोरा भी इस कार्यक्रम में आई थीं।

जाल सभागृह का हाल खचाखच भरा हुआ था। इस बार व्याखयान देने कृषि विशेषज्ञ देवेन्दर शर्मा आए थे। विषय था- खाली होती थालीः गहराता खाद्यान्न संकट। यह विषय मौजूं है विषय था- इस वर्ष महंगाई ने सबको रूला दिया। दाल के दाम इतने बढ गए कि लोगों की पहुंच से बाहर हो गए। इसके अलावा बीटी बैंगन का मामला भी सामने आया जिसका देश भर में काफी विरोध हुआ। और अंततः बीटी बैंगन को फिलहाल मंजूरी नहीं मिली।

ओमप्रकाश रावल समाजवादी चिंतक व विचारक होने के साथ अपने उतरार्ध जीवन में एक एक्टिविस्ट हो गए थे। चाहे नर्मदा बचाओ आंदोलन हो, एकता परिषद हो या होशंगाबाद का किसान आदिवासी संगठन। वे इनके कार्यक्रमों में जरूर पहुंचते। और लौटकर अखबारों में उस पर लिखते।

असल में रावल जी छोटे-छोटे जन संगठनों से ही एक वैकल्पिक शक्ति के निर्माण का सपना देख रहे थे। वे एक बेहतर का सपना देख रहे थे। इसी को वे रियल पॉलिटिक्स कहते थे। उल्लेखनीय है कि वे आपातकाल के दौरान मीसा के तहत बंदी रहे और १९७७ में जनता शासन में शि राज्यमंत्री भी रहे।

रावल जी अपने लंबे राजनैतिक व सामाजिक जीवन के अंतिम वर्षों में दलगत राजनीति से अलग होकर मैदानी जन संगठनों से जुड़ गए थे और उनमें लगे युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं में संभावनाएं देखते थे। उन्होंने कई सामाजिक कार्यकर्ता बनाए और प्रशिक्षित किए। उनमें से कई पत्रकार व अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

रावल जी की एक खासियत और थी, वे बहुत ही सादगी पसंद व्यक्ति थे। सहज और मिलनसार तो थे ही। वे मितभाषी होते हुए भी दूसरों को लंबी-चौडी बातें सुनने का धीरज रखते थे। नपे-तुले शब्दों में कही गई उनकी बात हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को सीख की तरह होती थी।

महेन्द्र भाई सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक संपादक थे। वे इसके माध्यम से हमेशा मैदानी जन संगठनों व उनके मुद्‌दे सामने लाते रहे। जल, जंगल, जमीन, खदान, विस्थापन, बडे बांध, पर्यावरण पर जोर देते थे। वे सप्रेस के माध्यम से हमेशा नए-नए लेखकों को तैयार करते थे। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों की सप्रेस पाठशाला होती थी।

सप्रेस का कोई व्यवस्थित दफतर भी नहीं था, घर के छोटे से कमरे से ही उनका सब काम-काज होता था। वे एक छोटी सी टेबल पर ही सारा लेखन व संपादन का सभी कार्य करते थे। यहीं से पूरे देश के अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं को सप्रेस का बुलेटिन भेजते। इस काम में उन्हें पूरे घर के सदस्यों का सहयोग मिलता। यहां तक उनके पोता भी लिफाफे पर गोद लगाता था। वे कहते थे कि जैसे किसान को खेती करनी है तो खेत पर रहना पड़ता है। इसलिए घर और दफतर अलग बनाने की जरूरत नहीं है।

सप्रेस का ५० वां वर्ष चल रहा है। वह वैकल्पिक मीडिया की वाहक रही है। १९६० में इन्दौर आए विनोबा भावे से मात्र एक रूप्ये की सहयोग राशि लेकर सप्रेस की शुरूआत महेन्द्र भाई ने की थी जिसके ५० वां वर्ष चल रहा है। कार्यकारी संपादक चिन्मय मिश्र हैं और इसमें उनके दोनों बेटे सिद्धार्थ और सम्यक भी लगातार अपना योगदान कर रहे हैं।

मालवा की इन दोनों हस्तियों की स्मृति में हुआ कार्यक्रम बहुत आत्मीय था। और कार्यक्रम समाप्ति के बाद मैं सोच रहा था कि क्या हम इन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से कुछ सीखकर आगे कुछ कर पाएंगे?

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