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	<title>Juggnu &#124; जुगनू</title>
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		<title>Juggnu &#124; जुगनू</title>
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		<title>सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे कृष्णमूर्ति</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Feb 2011 15:06:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मूर्ति जी नही रहे, यह खबर सुनकर विश्वास नहीं हुआ। हालांकि उनके अस्वस्थ होने की खबर कुछ दिन पहले लग चुकी थी। 10 फरवरी को उनका असमय निधन हो गया। वे 47 वरष के थे। मूर्ति जी यानी डा, कृष्णमूर्ति सिंह रघुवंशी। वे अपने मित्रों व प्रशंसकों के बीचं मूर्ति जी के ही नाम से [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=91&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="mceTemp">
<div id="attachment_92" class="wp-caption alignright" style="width: 227px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/02/krishnamurti.jpg"><img class="size-medium wp-image-92" title="krishnamurti" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/02/krishnamurti.jpg?w=217&#038;h=300" alt="" width="217" height="300" /></a><p class="wp-caption-text">कृष्णमूर्ति </p></div>
</div>
<p>मूर्ति जी नही रहे, यह खबर सुनकर विश्वास नहीं हुआ। हालांकि उनके अस्वस्थ होने की खबर कुछ दिन पहले लग चुकी थी। 10 फरवरी को उनका असमय निधन हो गया। वे 47 वरष के थे। मूर्ति जी यानी डा, कृष्णमूर्ति सिंह रघुवंशी। वे अपने मित्रों व प्रशंसकों के बीचं मूर्ति जी के ही नाम से जाने जाते थे। वे पिपरिया से निकल कर नौकरी के सिलसिले में कई जगह रहे।</p>
<p>पवारखेड़ा, जबलपुर और वर्तमान में जवाहर लाल कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत पन्ना में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक के रूप में पदस्थ थे। लेकिन उनकी जो छवि मेरे मानस पटल पर अंकित है, वह है उनका गहरा सामाजिक सरोकार। ग्रामीण जनजीवन और लोकसंस्कृति में रचा-बसा ठेठ देशज अंदाज।</p>
<p>बरसों बाद हाल ही मेरी उनसे मुलाकाल हुई थी। कार्तिक पूर्णिमा पर सांडिया मेले हम साथ गए थे। लंबे अरसे तक मेरे क्षेत्र से बाहर रहने के कारण उनसे संपर्क टूट गया था। लेकिन पिछले साल जब मैंने साथी राजनारायण पर संस्मरण लिखा तो उन्होंने भी न केवल पढ़ा बल्कि ब्लॉग पर प्रतिक्रिया दर्ज की। इसके बाद संवाद का सिलसिला शुरु हो गया।</p>
<p>सांडिया मेले में हम साथ-साथ घूमे। गोपाल राठी, उनकी पत्नी श्यामा जी, श्रीगोपाल गांगूड़ा, कैलाश सराठे आदि के साथ मैं पूरे दिन उनके साथ रहा। अलग-अलग विषयों पर काफी बातचीत हुईं। ग्रामीणों को बड़ी संख्या को मेले में देखकर वे रोमांचित व उत्साहित हो रहे थे। ग्रामीण जनजीवन के प्रति उनका गहरा जुड़ाव छलक रहा था। सारंगी बजा रहे साधु को देखकर हम रूक गए। मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहे। मैं उनका साथ पाकर इस बात से अभिभूत था कि अपने विषयों के अलावा उनकी विविध मुद्दों में रूचि है। नर्मदांचल के लोकरंग, ग्रामीण जनजीवन,कला और संस्कृति से उनका विशेष लगाव है।</p>
<p>आल्हा और रामायण पर की तर्ज पर उन्होंने अपने दो वरिष्ठ साथियों नरेन्द्र मौर्य और वीरेन्द्र दुबे के साथ मिलकर बुधनी की आल्हा और जंगल रामायण की रचना की। यह साझा प्रयास था, जो कला-संस्कृति के विकास का भी इतिहास रहा है। इस क्षेत्र में चल रहे किसान-मजदूरों की हक और इज्जत की लड़ाई लड़ने वाले समता संगठन, समाजवादी जनपरिषद और किसान मजदूर संगठन में यह नया सांस्कृतिक आयाम था।</p>
<p>प्रख्यात समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने इस प्रयास की सराहना की। बुधनी की आल्हा पर तो शिक्षाविद् कृष्ण कुमार और वरिष्ठ पत्रकार व कवियत्री सुश्री वसंता सूर्या ने लेख भी लिखे। सराहना की। मूर्ति जी ने आल्हा का अपनी आवाज में गायन किया जिसकी कैसेट काफी लोकप्रिय हुई। गोपाल राठी ने इस पूरे प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे इसकी धुरी बने रहे।</p>
<div id="attachment_93" class="wp-caption alignleft" style="width: 310px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/02/krishnamurti2.jpg"><img class="size-medium wp-image-93" title="krishnamurti" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/02/krishnamurti2.jpg?w=300&#038;h=233" alt="" width="300" height="233" /></a><p class="wp-caption-text">गोपाल राठी के साथ</p></div>
<p>वीरेन्द्र जी के अनुसार मूर्ति की आवाज अलग थी। उसे भीड़ में भी पहचाना जा सकता था। मधुर और अपनी ओर खींचने वाली चुंबकीय आवाज थी। वह आवाज कानों में गूंजती थी। गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर मूर्ति जी ने स्वतंत्र लेखन भी किया। उनकी कई रिर्पोटस स्थानीय अखबार कर्मपुत्र के साथ अन्य जगह भी प्रकाशित होती रही हैं। वे विद्यार्थी जीवन से ही समता युवजन सभा, समता संगठन की गतिविधियों से जुड गए थे। उनका यह जुड़ाव अंत तक बना रहा।</p>
<p>शहीद भगतसिंह पुस्तकालय के वे नियमित पाठकों में से रहे हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थी। शहर के सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। उनके मित्र और शुभचिंतकों और चाहने वालों का दायरा बहुत बड़ा है। उनकी दुनिया बड़ी थी। वे बहुत ही आत्मीय, खुले और जिंदादिल इंसान थे। उनमें एक ठेठ देशजपन समाया हुआ था।</p>
<p>इस दौरे में उनके साथ मिलकर खेती-किसानी पर भी बात हुई। किसानों पर मंडराते अभूतपूर्व संकट से वे अवगत थे। उन्होंने कहा था हम इस पर साथ काम करेंगे। मैं उत्साहित था। लेकिन अब यह नहीं हो पाएगा। बहरहाल, उनकी स्मृति सदैव रहेगी। मूर्ति जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।</p>
<br />Filed under: <a href='http://juggnu.wordpress.com/category/people/'>People</a> Tagged: <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/jnkvv-jabalpur/'>JNKVV Jabalpur</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/krishnamurti-raghuvanshi/'>KrishnaMurti Raghuvanshi</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/pipariya/'>Pipariya</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/sjp/'>SJP</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/juggnu.wordpress.com/91/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/juggnu.wordpress.com/91/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=91&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>प्रेम मनमौजी का अनूठा कला संसार</title>
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		<pubDate>Mon, 03 Jan 2011 12:15:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_85" class="wp-caption alignright" style="width: 216px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/01/prem-manmoji.jpg"><img class="size-medium wp-image-85 " title="Prem Manmoji" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/01/prem-manmoji.jpg?w=206&#038;h=300" alt="" width="206" height="300" /></a><p class="wp-caption-text">प्रेम मनमौजी </p></div>
<p>﻿﻿हाल ही में मेरी मुलाकात प्रेम मनमौजी से हुई, जो उज्जैन से पिपरिया में एक बाल मेले में आए थे। उनसे पहले भी मिल चुका हूं, पर इस बार अरसे बाद मिला तो बहुत प्रसन्नता हुई। और यह तब और बढ़ गई जब उनकी कलाकृतियों से रू-ब-रू हुआ। उन्होंने पेड़ की सूखी पत्तियों से चिड़िया, चूहा, बिल्ली, शेर, घोड़ा, हाथी गाय आदि आकृतियां बनाई हुई थी। कागज को काटकर खरगोश, शेर, गाय, भैंस और मनुष्य के मुखौटे बनाए हुए थे जिनमें रंगीन पेसिल से रंग भरे हुए थे, जो बहुत सुंदर लग रहे थे। मैं देर तक निहारता रहा। उनकी कलाकृतियों को देखकर मुझे कला गुरू विष्णु चिंचालकर की याद आ गई जिन्हें प्रेम भी अपना गुरू मानते हैं।</p>
<p>गुरूजी प्रकृति को अपना गुरू मानते थे। वे कहते थे प्रकृति ही कलाकार का सबसे बड़ा शिक्षक है। उसमें ढेरों आकृतियां और सौंदर्य छुपा है, जिसे कलाकार को पहचानकर उसके अनुरूप ही चित्रों को आकार देना है। यही काम बखूबी प्रेम मनमौजी कर रहे हैं।</p>
<p>प्रेम बचपन से मूर्तियां बनाने के शौकीन थे। उन्हें अपनी कला को निखारने और आगे बढ़ाने का मौका एकलव्य संस्था में आकर मिला। यह संस्था शिक्षा के क्षेत्र में पिछले 30 वर्षो से कार्यरत है। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम एकलव्य की ही देन थी, जिसकी सराहना देश-विदेश में काफी हुई।</p>
<p>उन्होंने साफ-सफाई के काम से संस्था में शुरूआत की। लेकिन जल्द ही उनकी प्रतिभा को संस्था को पहचान मिली और उनकी रूचि व लगन के अनुसारं वे कला और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ गए। बाद में भी संस्था ने उन्हें काफी मौके उपलब्ध कराए। असल में एकलव्य का काम ही अलग-अलग तरह की प्रतिभाओं को सामने लाना और आगे बढ़ाना है। बच्चों की पत्रिका चकमक ने कई लेखक और चित्रकार तैयार किए हैं।</p>
<p>प्रेम के अंदर का सुप्त कलाकार तब अच्छी तरह जागा और सक्रिय हुआ, जब वे वर्ष 1985 में गुरूजी (विष्णु चिंचालकर) से मिले। देवास के पास हाटपीपल्या में एकलव्य के कार्यक्रम में गुरूजी आए हुए थे। वहां गुरूजी ने बहुत ही मामूली चीजों से बहुत ही आकर्षक और सुंदर कलाकृतियां बनाई।</p>
<p>मुझे खुद गुरूजी ने इंदौर के संवाद नगर स्थित घर में ऐसी ढेर चीजें दिखाई थीं। सुपारी से गणेशजी, आम की गुठली से टैगोर और टूटी चप्पल की मोनालिसा की याद अब भी है। हिन्दी और अंग्रेजी के अक्षरों से विभिन्न तरह की आकृतियां बनाई थी। गुरूजी अक्षरों से खेलते थे और उनसे विभिन्न तरह के चित्र बनाते रहते थे। उनकी इस परिकल्पना के आधार पर कई और लोगों ने ऐसे प्रयोग किए हैं।</p>
<p>गुरूजी की इसी विधा को प्रेम मनमौजी ने अपनाया। बहुत ही कम संसाधनों में कला को बेहतर रूप दिया। उनका कहना है कि अगर हम केवल पत्तियों से आकृतियां बनाने की बात करें तो पेड़ों से गिरी हुई पुरानी पत्तियों को एकत्र करें। पेड़ों से ताजी पत्तियां न तोडे। पुरानी पत्तियों में कुछ अलग-अलग रंग भी मिल जाते हैं, जो कि ताजी पत्तियों में नहीं मिलते।</p>
<p>प्रेम कहते हैं कि सबसे पहले पत्तियों को गौर से देखें-उनमें कौन सी आकृति छुपी है। उसकी कल्पना करें और फिर उसे उसके अनुरूप उसे आकार दें। चित्र की कल्पना हरेक बच्चे की अलग-अलग हो सकती है। इनसे उल्लू, मेंढ़क, गौरेया, चूहा, बिल्ली कुछ भी बनाया जा सकता है।</p>
<p>प्रेम मनमौजी की पत्तियों के रचना संसार पर एक किताब भी आ <a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/01/balmela.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-86" title="Bal Mela" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2011/01/balmelaedit.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" width="300" height="225" /></a>चुकी है। इस किताब का विमोचन वर्ष  1997 मे खुद गुरूजी ने किया था। कई जगह कला प्रदर्शनी लग चुकी हैं। उन्हें अखिल भारतीय कालिदास कला प्रदर्शनी सम्मान मिल चुका है। उनकी कला पर देश-प्रदेश की पत्र-पत्रिकाओं में छप चुका है।</p>
<p>वे न केवल पत्तियों से आकृतियां बनाते हैं बल्कि काष्ठ और मिट्टी से भी बनाते हैं। इसके अलावा जादू दिखाते हैं। कागज की कई आकृतियां बनाते हैं। चूंकि वे उज्जैन में रहते हैं। उज्जैन की कला और संस्कृति के क्षेत्र में समृद्ध परंपरा रही है। इसका निशिचत ही उनकी कला पर प्रभाव दिखता है। इस ओर बच्चे भी प्रयास करें तो उन्हें भी मजा आएगा और अगर चित्रों के बारे में लिखें तो भाषा और लेखन क्षमता भी बढ़ेगी। स्कूल के बाहर ऐसी गतिविधियों से शिक्षण बहुत ही उपयोगी होगा।</p>
<br />Filed under: <a href='http://juggnu.wordpress.com/category/uncategorized/'>Uncategorized</a> Tagged: <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/prem-manmoji/'>'Prem Manmoji'</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/art/'>Art</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/eklavya/'>eklavya</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/juggnu/'>Juggnu</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/ujjain/'>ujjain</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/juggnu.wordpress.com/80/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/juggnu.wordpress.com/80/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=80&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>सिर्फ संत नहीं, सच्चे समाजवादी थे सुरेन्द्र मोहन</title>
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		<pubDate>Tue, 21 Dec 2010 10:10:03 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सुरेन्द्र जी नहीं रहे, यह खबर फोन पर गोपाल भाई ने दी। मैं फोन पर उनसे ज्यादा बात न कर सका। मानस पटल पर एक के बाद एक कई छवियां उभरती &#8211; मिटती गईं। इसलिए नहीं कि मुझे उनका कुछ समय सानिध्य और वात्सल्यवत् स्नेह मिला। बल्कि इसलिए भी कि वे ईमानदार, सादगी पसंद, सहज-सरल [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=73&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_74" class="wp-caption alignleft" style="width: 238px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/12/surendra-mohan.jpg"><img class="size-medium wp-image-74" title="surendra mohan" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/12/surendra-mohan21.jpg?w=228&#038;h=300" alt="" width="228" height="300" /></a><p class="wp-caption-text">सुरेन्द्र मोहन</p></div>
<p>सुरेन्द्र जी नहीं रहे, यह खबर फोन पर गोपाल भाई ने दी। मैं फोन पर उनसे ज्यादा बात न कर सका। मानस पटल पर एक के बाद एक कई छवियां उभरती &#8211; मिटती गईं। इसलिए नहीं कि मुझे उनका कुछ समय सानिध्य और वात्सल्यवत् स्नेह मिला। बल्कि इसलिए भी कि वे ईमानदार, सादगी पसंद, सहज-सरल और सैद्धांतिक निष्ठा वाले समाजवादी राजनैतिक कार्यकर्ता थे, जिनकी आज राजनीति में कमी दिखाई देती है।</p>
<p>सफेद-कुर्ता पायजामा, लंबी कद-काठी, चेहरे पर चष्मा और ओठों पर चिर-परिचित मुस्कान, यही सुरेन्द्र जी पहचान थी। न कोई तामझाम और न कोई औपचारिकता। वे सहज उपलब्ध थे। खासतौर से आज जब बड़े लोगों से बिना अनुमति मिल नहीं सकते, तब सुरेंद्र जी का न केवल सानिघ्य पा सकते थे बल्कि उनसे बात भी कर सकते थे।</p>
<p>वे आजादी की लड़ाई के सहयात्री रहे। एक-दो साल काशी विद्यापीठ में पढ़ाने के बाद फिर समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता बन गए। हालांकि फिर भी उनका पढ़ाई-लिखाई से आजीवन रिश्ता बना रहा। वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लगातार लिखते रहे। उनके लेख देश भर के हिंदी-अंग्रेजी अखबारो में छपते रहे। उनके लेखों में सदैव हाशिये के लोगों की चिंता होती थी, जो प्रायः आज मीडिया में नहीं दिखाई देती।</p>
<p>सत्ता के एकदम करीब रहकर भी उससे दूर बने रहे। जयप्रकाश नारायण से लेकर राममनोहर लोहिया के साथी रहे। आपातकाल में जेल भी काटी। जनता पार्टी के महासचिव रहे। बाद में राज्यसभा सांसद भी रहे। वे अपने अंतिम समय ८४ वर्श तक मानसिक और शारीरिक रूप से सक्रिय रहे। और मृत्यु के एक दिन पूर्व तक एक धरने में शामिल हुए।</p>
<p>सुरेन्द्र जी बहुत ही सहज-सरल व्यक्ति थे। इसका यहां एक उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा कि जब मैं वर्श 2004 में दिल्ली के उनके ही अपार्टमेंट सहविकास में किराये से रहने लगा और इसका पता उन्हें चला तो वे खुद ही मिलने चले आए। फिर तो कई बार मुलाकातें हुईं। उनकी पत्नी मंजू मोहन जी का भी स्नेह मिला। और वे सदैव हमारा ध्यान रखती थीं।</p>
<p>लेकिन उनका यह स्नेह केवल मुझ से ही हो, ऐसा नहीं है बल्कि हर उस जमीनी कार्यकर्ताओं से उनका गहरा लगाव था, स्नेह था, जो जन सरोकारों से जुड़े हुए थे। देश भर में अलग-अलग समूहों से जुड़े लोग उनसे मिलने आते रहते थे। सुरेन्द्र जी के पास हर ऐसे लोगों को समय भी था। उम्मीद थी। प्रोत्साहन था। इसका एक उदाहरण देना अनुचित न होगा कि होशंगाबाद जिले में समता संगठन के उम्मीदवार श्रीगोपाल गांगूड़ा के समर्थन में वे समय निकालकर चुनावी सभा को संबोधित करने आए थे। शायद इसलिए कि वे चाहते थे राजनीति में नीचे से बदलाव हो।</p>
<p>मुझे जो चीज सबसे प्रभावित करती है वह उनकी ईमानदारी और सैद्धांतिक निष्ठा। आज राजनीति में सिद्धांतों और मूल्यों को अयोग्यता के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन सुरेन्द्र जी, किशन पटनायक जैसे लोगों को देखकर राजनीति में संभावनाएं नजर आती हैं। और इसमें ही लोकतंत्र का भविश्य उज्जवल हो सकता है। लोकतंत्र में ही यह करिश्मा है कि समाज के निचले स्तर का आदमी शिखर पर पहुंच सकता है।</p>
<p>हमारे देश में हर बड़े व्यक्तित्व को महान और संत बनाने की परंपरा है। सुरेंद्र जी स्वभाव और जीवनशॆली में भले ही संत और महात्मा जैसे लगते हों, लेकिन वे सही मायनों में एक ईमानदार, सादगी पसंग, सरल और सच्चे समाजवादी थे।</p>
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		<title>राजनारायण केसला वारे, सांचहु बहुत हौसला वारे</title>
		<link>http://juggnu.wordpress.com/2010/04/26/rajnarayan/</link>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 09:50:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
				<category><![CDATA[People]]></category>
		<category><![CDATA[Hoshangabad]]></category>
		<category><![CDATA[kisan-adivasi-sangathan]]></category>
		<category><![CDATA[MadhyaPradesh]]></category>

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			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_54" class="wp-caption alignleft" style="width: 257px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/rajnarayan.jpg"><img class="size-medium wp-image-54" title="Rajnarayan" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/rajnarayan2.jpg?w=247&#038;h=312" alt="" width="247" height="312" /></a><p class="wp-caption-text">राजनारायण</p></div>
<p>वर्ष 1989 की बात है। मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री को चिट्‌ठी लिखकर इस क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराया था। इस चिट्‌ठी ने देश का ध्यान इस अंचल के आदिवासियों की समस्याओं की ओर खींचा। केसला विकासखंड आदिवासी बाहुल्य है और यहां कई परियोजनाओं से आदिवासी उजड़े हैं। यह चिट्‌ठी उन्होंने जेल से लिखी थी। इन कार्यकर्ताओं का कसूर यह था कि उन्होंने आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई में साथ दिया था। जिन दो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चिट्‌ठी लिखी थी उनमें से एक राजनारायण था जिसका एक सड क हादसे में 26 अप्रैल 1990 को निधन हो गया। उसकी 20 वीं पुण्यतिथि है।</p>
<p>राजनारायण के बारे में जब मैं सोचता हूं तो मेरे स्मृति पटल पर उसकी कई छवियां उभर आती हैं। दुबला-पतला, दाढी और चश्मा वाला तेजतर्रार आदर्शवादी युवक। शांत और मिलनसार मित्र। अभाव और मुशिकलों में अडिग रहना वाला कार्यकर्ता। जंगल और पहाड़ में रहने वाले आदिवासियों का सच्चा हमदर्द। अन्याय के खिलाफ हाथ उठाकर जोशीले नारे लगाने वाला साथी। धरना और जुलूस में ठेठ लोक शेली में मस्ती से गीत गाने वाला समाजवादी।</p>
<p>आज जब नई पीढी प्रतियोगिताओं को पार कर इस व्यवस्था में अपने भविष्य की तलाश कर रही है तब कुछ बरस पहले इटारसी का एक युवक सब कुछ छोड कर समाजवादी सपने को साकार करने के लिए जंगल के बीच अकेला ही रहने लगा, यह कुछ अजीब सा लगता है। राजनारायण ही वह युवक था। 80 के दशक में कुछ समाजवादियों के संपर्क में आने के बाद वह आदिवासी बहुल विकासखंड केसला के पास बांसलाखेडा ( सहेली ) में रहने लगा था। यहां विखयात समाजवादियों ने लोहिया अकादमी नामक समिति बनाई थी जिसमें 50 एकड से ज्यादा जमीन थी।</p>
<p>राजनारायण इटारसी के एक शिक्षक का बेटा था। बी. कॉम की पढ़ाई बीच में ही छोड कर ही उसका समाजवादी विचारों की तरफ रूझान बढा। वह पहले युवा जनता में शामिल था और वह यह समझ गया कि मौजूदा राजनैतिक दल आम जनता की समस्याओं को हल करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच मैदानी काम करना जरूरी है। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक व समाजवाद के संपर्क में आया और उनके मार्गदर्शन में आदिवासी और किसानों को संगठित करने में लग गया। समता संगठन से जुड गया, जो मुखयधारा की राजनीति से अलग समाजवादी विचारों का एक राजनैतिक संगठन था। 1995 में यह समाजवादी जनपरिषद नामक राजनैतिक दल में समाहित हो गया। आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई को आगे बढाने के लिए स्थानीय स्तर पर वर्ष 1985 में किसान आदिवासी संगठन नामक संगठन बनाया था।</p>
<p>इधर पिपरिया में भी गोपाल राठी जैसे समाजवादी युवकों से राजनारायण की मित्रता थी जो समय-समय पर उसे मदद करते थे। जब कभी राजनारायण को अपने कामों से अवकाश मिलता, वह पिपरिया के साथियों से आकर जरूर मिलता था। धीरे-धीरे केसला के आदिवासियों के दुख-दर्द अब बाहर आने लगे थे। बाद में जवाहरलाल विश्वविद्यालय की पढ़ाई अधूरी छोड कर सुनील भी राजनारायण के साथ मिलकर आदिवासियों की हक और इज्जत की लडाई में शामिल हो गए। बाद में उनकी पत्नी स्मिता भी आ गईं। आलोक सागर और सुरेन्द्र झा भी टीम में शामिल हो गए। इसके बाद तो धरना, जुलूस, पदयात्राओं का सिलसिला शुरू हो गया।</p>
<p>केसला, इटारसी, होशंगाबाद और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल तक आदिवासी गए। भोपाल से बैतूल की सडक जुलूस और रैलियों की गवाह बनी। यहां आदिवासियों का तथाकथित विकास के लिए कई बार विस्थापन की पीडा से गुजरना पडा है। तवा बांध, प्रूफरेंज, आर्डिनेंस फैक्टी विस्थापन हुआ। उजडे-उखडे लोगों को न मुआवजा मिला और न ही जमीन। और जो थोडा बहुत मुआवजा मिला भी तो वह इतना कम था कि वह विस्थापितों के मजाक ही कहा जाएगा।</p>
<p>इटारसी के आगे बागदेव के पुल के इस तरफ की दुनिया और उस तरफ जंगल में आदिवासियों की दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर है। इस तरफ जंगल से डर कर भागने वाले लोग थे और दूसरी तरफ जंगल में ही रहने वाले लोग थे। एक तरफ भोगवादी जीवन के आदी लोग थे दूसरी प्रकृति के साथ</p>
<p>सबसे कम संसाधनों में जिंदा रहने वाले लोग थे जिनसे उनके ये प्राकृतिक संसाधन छीनने की कोशिश की जा रही थी। राजनारायण ने इन्हीं गोंड-कोरकू आदिवासियों की</p>
<p>आवाज को बुलंद किया। जो गोंड-कोरकू आदिवासी शर्ट-पेंट पहने आदमी को देखकर सहम जाते थे। वे सड़क पर अपने हकों के लिए खडे होने लगे।</p>
<p>वर्ष 1985 के आसपास मैं बांसलाखेडा पहली बार गया था और एक महीने रहा था। हरे-भरे जंगल के बीच नदी किनारे का यह स्थान बहुत ही रमणीक था। राजनारायण अपने मां-बाप के साथ रहते थे। सुनील जी उसी समय दिल्ली से यहां आए थे। सुनील जी और राजनारायण के साथ कई गांवों में घूमा। एक माह बाद पानी के लिए होशंगाबाद तक पदयात्रा हुई। जब पदयात्रा पथरौटा पहुंची तब राजनारायण ने वहां साइकिल रिक्शे पर बैठकर माइक से लोगों को संबोधित किया। वह जोश से भरा चेहरा मेरे आंखों के सामने तैर रहा है।</p>
<p>वह जनता के साथ एकाकार हो गया था। गांव-गांव घूमना, लोगों के साथ उठना-बैठना। उनके दुख-तकलीफों को सुनना-समझना और उन्हें संगठित करना, उसका काम था। वह गांव जाकर आने के लिए उतावला नहीं होता था। वह वहां रूकता था, खाता-पीता था और लोगों के साथ बैठकें करता था। बाद में उसने जो आंदोलन के बीज बोए वह बैतूल, सिवनी-मालवा और बनखेड़ी-पिपरिया तक पहुंच गए।</p>
<div id="attachment_57" class="wp-caption alignright" style="width: 305px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/rajnarayan2.jpg"><img class="size-medium wp-image-57" title="Rajnarayan" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/rajnarayan.jpg?w=295&#038;h=465" alt="" width="295" height="465" /></a><p class="wp-caption-text">राजनारायण</p></div>
<p>मुझ जैसे राजनारायण के मित्र हैं, जिन्हें वह उम्मीद की किरण था। अब राजनारायण नहीं है। सुनील जी हैं, उन्हें तो लोग कई बार राजनारायण ही समझते हैं। कद-काठी और दाढी-चशमे के कारण सुनील और राजनारायण में फर्क करना मुद्गिकल है। राजनारायण की याद में एक नारा लगाया जाता था कि साथी तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएंगे, यह सफर जारी है। साहित्यकार</p>
<p>कश्मीर उप्पल ने लिखा है कि यह मसीहा पहाडी पर एक तेज आंख की तरह हमें देखता रहेगा</p>
<p>और राह भी दिखाएगा। ऐसे सच्चे, आदर्शवादी समाजवादी मित्र के व्यक्तित्व से सीखकर हम कुछ कर पाएं तो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।<br />
                               -बाबा मायाराम</p>
<p>                                                       </p>
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		<title>जिसका है जनता से सरोकार, वह है यारों का यार</title>
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		<pubDate>Thu, 15 Apr 2010 08:57:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[मैं सतपुड़ा अंचल में जिन लोगों से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, उनमें से एक हैं गोपाल राठी। इसलिए नहीं कि वे मेरे भ्रातृतुल्य स्नेही मित्र हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे गत ३० बरसों से इस अंचल के किसान, आदिवासियों और दलितों के संघर्ष में शामिल रहे हैं। वे न केवल इनमें खुद मौजूद रहते [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=41&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="size-medium wp-image-42 alignleft" title="Gopal Rathi" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/img_0274.jpg?w=254&#038;h=338" alt="" width="254" height="338" />मैं सतपुड़ा अंचल में जिन लोगों से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं, उनमें से एक हैं गोपाल राठी। इसलिए नहीं कि वे मेरे भ्रातृतुल्य स्नेही मित्र हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे गत ३० बरसों से इस अंचल के किसान, आदिवासियों और दलितों के संघर्ष में शामिल रहे हैं। वे न केवल इनमें खुद मौजूद रहते हैं, बल्कि इसमें दूसरों को भी जोडने का प्रयास करते हैं। वे इनमें इतने गहरे रचे-बसे हैं कि उनकी बातचीत का मुद्‌दा सदैव ऐसे ही विषय रहते हैं जिनका लोगों से सीधा सरोकार हो।</p>
<p>जब मैं उनके बारे में सोचता हूं तब मुझे उनका ऊर्जा से ओत-प्रोत चेहरा सामने आता है। उनमें नीरस व निराशा के माहौल को सहज और हल्का बनाने की कला है। नौजवानों व मित्रों का जोशीले अंदाज में उत्साह बढाना, उनकी विशोषता कही जा सकती है। संचार क्रांति के इस दौर में उनके मोबाईल की घंटी फुरसत के क्षणों को कुछ अर्थ देती हो या न देती हो, भीड  में अकेलेपन के सन्नाटे को जरूर तोड ती है। कभी हम उनकी बेकरारी से खीझते भी हैं, लेकिन फिर समझ आता है कि इसमें उनकी कुछ गुजरने की तडप है।</p>
<p>जब वे जन आंदोलनों में माइक पकडते हैं, तो एक अलग समां बंध जाता है। जब वे मौजूद रहते हैं तब सभा या कार्यक्रम का संचालन कोई और करे, शायद ही ऐसा देखा गया है। इसका एक कारण तो उनका लोगों के प्रति गहरा समर्पण है, दूसरा वाकपटुता और लोगों से सीधा साक्षात्कार करने की उनकी चाहत भी है। मुद्‌दों की समझ तो है ही।</p>
<p>मध्यप्रदेश के एक छोटे कस्बे में वे निवास करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एकलव्य के साथ काम करते हुए भी वे हमेशा अंचल के जन सरोकारों से तो जुड़े ही रहते हैं। प्रदेश स्तर पर जन संगठनों के साथ भी उनका रिशता बना हुआ है।</p>
<p>करीब २०-३० साल पहले उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ पिपरिया में समता अध्ययन केन्द्र की द्यशुरूआत की थी। सांडिया रोड पर एक छोटे से कमरे में एक पुस्तकालय चलता था जिसमें अधिकांश पुस्तकें अपने मित्रों व सहानुभूति रखने वाले लोगों से एकत्र की गई थी। पुस्तकालय में साहित्यिक किताबें तो थी, राजनीतिक विचारों की किताबें थी। जिनमें मार्क्स, गांधी, लोहिया, जयप्रकाश, विवेकानंद, भगतसिंह और समाजवादी साहित्य उपलब्ध था। यहां बडी संखया में युवजन एकत्रित होते थे।</p>
<p>दिनमान में समाजवादी चिंतक किशन पटनायक का लेख पढ कर गोपाल भाई ने पत्र लिखा था और किशन जी ने उस पत्र के जवाब में उन्हें मिलने के लिए कहा था। यहां उन्होने समता संगठन की नींव डाली। बाद में बरसों तक किशन पटनायक का इस अंचल से करीबी रिशता बना और उन्होंने यहां के समाजवादी विचारों से प्रेरित जन संगठनों का मार्गदर्शन किया। चाहे केसला विकासखंड में आदिवासियों के हक और इज्जत की लडाई हो या बनखेडी क्षेत्र में किसान मजदूरों की। सभी जगह किशन पटनायक और सुनील सरीखी हस्तियां का नेतृत्व मिलता रहा। गोपाल भाई की इन सबमें महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा सकती है। उन्ही के प्रयास से श्रीगोपाल गांगूडा व हरगोविंद राय जैसे युवा भी समाजवादी विचारधारा से जुडे, जो सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय रहे।</p>
<p>ज्वलंत समस्याओं पर अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने यहां चौराहे पर बोर्ड रखने की शुरूआत की। स्थानीय झंडा चौराहे पर बोर्ड चर्चा व कौतूहल का <a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/dscf7045.jpg"><img class="alignright size-medium wp-image-44" title="with children" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/dscf7045.jpg?w=324&#038;h=242" alt="" width="324" height="242" /></a>विषय बनता रहा है। चाहे असम समस्या हो या बिहार प्रेस बिल, सांप्रदायिकता के खिलाफ मुहिम हो या किसान-आदिवासियों पर जुल्म। बोर्ड पर लिखी टिप्पणियां और नारे हमेशा चर्चा में रहे। समाजवादी राजनीति से गहरा जुड़ाव उनकी टिप्पणियों व नारों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। कई बार तो अखबारों ने भी बोर्ड के संदेश को प्रचारित-प्रसारित किया। यह वैकल्पिक मीडिया का भी एक प्रयोग माना जा सकता है। खासतौर से ऐसे समय में जब जन सरोकारों को मीडिया में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है।</p>
<p>उनका नई पीढी से खास लगाव है। वे मोबाईल व इंटरनेट के माध्यम से जुडे रहते हैं। इसके अलावा, एकलब्य पुस्तकालय में रोजाना करीब ४०-५० युवजन आते हैं। पुस्तकालय में कमलेश भार्गव का साथ है। यह पुस्तकालय गतिविधि केंद्र भी है, जहां समय-समय पर विभिन्न विषयों पर चर्चा गोच्च्ठी का आयोजन होता रहता है। यहां प्रखयात पत्रकार प्रभाष जोशी, शिक्षाविद्‌ अनिल सद्‌गोपाल, विनोद रायना, सुशील जोशी, विष्णु नागर जैसी हस्तियां आ चुकी हैं और उनकी वे सराहना प्राप्त कर चुके हैं। उनके बारे में लिखना का एक बहाना उनका जन्मदिन है, हालांकि वे जन्मदिन मनाने के पक्षधर नहीं है। उनका ५१ वां जन्मदिन है। सदैव नई ऊर्जा से अपने मिशन में लगे रहें, ऐसी कामना है।</p>
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			<media:title type="html">Gopal Rathi</media:title>
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		<title>पचमढ़ी की चिनगारी</title>
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		<pubDate>Thu, 01 Apr 2010 15:49:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Hope]]></category>
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			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-medium wp-image-32" title="Satpuda ki vaadiya" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/pachmadhi-066.jpg?w=388&#038;h=272" alt="" width="388" height="272" />जब कभी भी मेरा पचमढ़ी जाना होता है। मोतीलाल जैन जी जरूर मिलता हूं। इस बार वे कुछ व्यथित दिखे। उनकी पीडा निजी नहीं, सार्वजनिक थी। कहने लगे हम पहले रोटी, कपडा और मकान, मांग रहा है हिन्दुस्तान, का नारा लगाया करते थे, यह आज भी प्रासंगिक है। आज भी हिन्दुस्तान की बुनियादी समस्याएं वहीं हैं, जो पहले थी। आज भी दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, अशिक्षित और बेघर लोग भारत में रहते हैं। देश के ३ वर्ष से छोटे बच्चों के लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं।</p>
<p>८४ साल के वयोवृद्ध मोतीलाल जी आजादी की लडाई के सिपाही तो थे ही, बाद भी लगातार सक्रिय रहे। समाजवादी सिद्धांतों में विशवास करने वाले मोतीलाल जी कहते हैं &#8221;उनके कई साथी इधर-उधर चले गए लेकिन वे कहीं नहीं गए। क्योंकि समाजवाद से ही देश में बराबरी का समाज बन सकता है।&#8221; उनकी राजनीति में खासतौर से रचना के कामों में विशेष रूचि रही है और अब भी है।</p>
<p>सतपुडा की रानी पचमढ़ी देश-दुनिया में पर्यटन के लिए मशहूर है। यहां प्रकृति की अपनी ही निराली छटा है। सतपुडा की सबसे बडी चोटी धूपगढ , महादेव और कई मनोरम दृद्गय हैं। महादेव की चोटी पर्वतारोहियों के लिए बहुत आकर्षक है। ऐतिहासिक पांडव गुफाएं हैं, जिनके नाम पर इसका नाम पचमढ़ी पडा है। जंगल और पहाडों के बीच कल-कल झरनों को बहते अविराम देखते ही रहो। बहुत सुकून मिलता है। शंत और शोंरगुल से दूर। ऊंचे-ऊंचे पहाड वृक्षों और लताओं से ढके हुए। बहुत ही मनमोहक। सतपुडा की पर्वत श्रृंखला अमरकंटक से असीरगढ तक फैली हुई हैं। दक्षिण में सतपुडा के पर्वत नर्मदा नदी के समानांतर पूर्व से पशिचम की ओर चलते हैं।</p>
<p>मोतीलाल जी कर्मभूमि पचमढ़ी रही है। आजादी से पहले वे हस्तलिखित पत्रिका चिनगारी निकाला करते थे और उसे बारी-बारी से पढने को देते थे। उस समय कोई प्रेस तो था नहीं। समाचार पत्र भी सिर्फ दो आते थे कर्मवीर और विशवामित्र। लोगों को आजादी की लडाई की जानकारी देने के उद्‌देशय से चिनगारी शुरू की जिसमें अधिकांश खबरें समाचार पत्रों से ली जाती थी। एक महीने में यह पत्रिका ३० घरों में पढी जाती थी।</p>
<p>राजनैतिक चेतना जगाने के लिए उन्होंने जनता पुस्तकालय खोला। उनका मानना है कि जब तक आदमी पढेगा नहीं तब तक पूरी समझ नहीं बन पाएगी। इस पुस्तकालय में साहित्य के अलावा राजनैतिक पुस्तकें भी होती थीं। मनमथनाथ गुप्त, आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया आदि कई लेखकों व विचारकों की पुस्तकें थी। इसमें एक नियम यह था कि जो भी सदस्य बडे शहरों में किसी काम से जाए, वह वहां से पुस्तकें लेकर आए । इस तरह पांच सौ से ज्यादा पुस्तकें पुस्तकालय में हो गई थीं। मजदूरों को जोड ने के लिए मनोरंजन क्लब आदि चलाते थे, जहां राजनैतिक चर्चाएं होती थीं। वे अनपढ लोगों को पढाते थे।</p>
<p>वे शराबबंदी आंदोलन चलाते थे। जिस किसी के घर में कच्ची द्गाराब बनने की खबर मिलती, वहां पहुंचकर शराब बनाने के लिए इस्तेमाल में आने वाले मिट्‌टी के बर्तनों को तोड देते थे। इससे लोग स्वस्थ रहते थे और उनके पास कुछ पैसे भी होते थे। अन्यथा लोग अपनी कमाई शराब में गंवा देते थे तो घर में भोजन के लिए जरूरी सामग्री खरीदने के लिए पैसे भी नहीं होते थे। इसी प्रकार वे समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाते थे।</p>
<p>महाशिवरात्रि पर्व पर पचमढी में मेला लगता था। उसमें एक स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की टोली होती थी। उसमें मोतीलाल जी बढ -चढ कर हिस्सा लेते थे। व्यवस्था में मदद के लिए एक शिविर लगता था। कार्यकर्ताओं की लाल रंग की विशेष ड्रेस हुआ करती थी। हेलमेट सिर पर लगाते थे। यात्रियों और श्रद्धालुओं की व्यवस्था का पूरा खयाल रखा जाता था।</p>
<p>मोतीलाल जी बताते हैं समाजवादी पचमढ़ी में जनता थाना चलाते थे। इसका उद्‌देद्गय आपस के झगडो का आपसी सहमति से</p>
<div id="attachment_34" class="wp-caption alignright" style="width: 235px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/picture-158.jpg"><img class="size-medium wp-image-34" title="Motilal Jain" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/04/picture-158.jpg?w=225&#038;h=300" alt="" width="225" height="300" /></a><p class="wp-caption-text">मोतीलाल जैन</p></div>
<p>निपटारा करना होता था। यह बहुत सफल रहा। लोग इसमें अपनी शिकायत दर्ज कराते थे। दूसरे पक्ष को बुलाया जाता था और समझौता करने की कोशिश की जाती थी। वे कहते हैं उस दौरान थाने में दर्ज मामलों की संखया नगण्य हो गई थी। इस बात से पुलिस के आला अफसल आशचर्यचकित थे।</p>
<p>मोतीलाल जी को जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया सरीखे समाजवादी नेताओं का सानिध्य व स्नेह मिल चुका है। वे पचमढी समाजवादी अधिवेशन में भी रहे। और इस अधिवेशन के बाद लोहिया यहां दो माह तक रहे और उन्होंने यहां रहकर किताब एक लिखी। इस तरह समाजवाद से गहरा जुडाव हुआ और वे आज भी समाजवाद को ही लोगों की समस्याओं का समाधान मानते हैं।</p>
<p>वे याद करते हैं इस इलाके के १८५७ की लडाई में शामिल रहे भभूतसिंह को। वे कहते हैं अंग्रेज आदिवासियों से अंडा-मुर्गी मांगते थे। उनका अपमान करते थे। भभूतसिंह ने इसका डटकर विरोध किया। वह दिलेर आदमी था और सतपुडा की पहाडि यों से भलीभांति परिचित था। आदिवासियों का उसे पूरा समर्थन प्राप्त था। उसने अंग्रेजों को कडी टक्कर दी। तात्या टोपे ने भी उसमें सहयोग दिया। महीनों तक संघर्ष चला। लेकिन धोखे से उसे पकड लिया गया और बाद में जबलपुर जेल में उसे फांसी दे दी गई।</p>
<p>वयोवृद्ध मोतीलाल जी आज भी देश-दुनिया से बेखबर नहीं हैं। वे समाचार पत्र पढ़ते हैं, किताबें पढ ते हैं, देश-दुनिया की खबर लेते हैं। देश की गरीबी और भुखमरी से व्यथित है, परेशान हैं। लेकिन हमारे आज के गद्‌दी पर बैठने वाले लोग इससे बेखबर हैं। मोतीलाल जी से मिलकर सदा श्रद्धा व सम्मान से मन भर जाता है। पचमढी से लौटते समय मैं सोच रहा था राजनीति में अब ऐसे लोग क्यों नहीं आते?</p>
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		<title>बेहतर समाज का सपना देखने वाली हस्तियों की याद में</title>
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		<pubDate>Thu, 25 Feb 2010 01:56:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignleft size-medium wp-image-23" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/02/picture-070.jpg?w=300&#038;h=225" alt="" width="300" height="225" />हाल ही में २० फरवरी को मेरा इंदौर जाना हुआ। मौका था- रावल जी यानी ओमप्रकाश रावल और महेन्द्र भाई यानी महेन्द्र कुमार की स्मृति कार्यक्रम का। रावल जी की यह १५ वीं पुण्यतिथि थी और महेन्द्र भाई की ७ वीं। दोनों में समानता यह है कि वे जन संगठनों के बड़े हिमायती थे और सामाजिक क्षेत्र में रूचि रखने वाले युवाओं की पीठ पर हाथ रख उन्हें आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करते थे। इसलिए आयोजकों ने भी दोनों विभूतियों का अनूठा संयुक्त कार्यक्रम का आयोजन किया। यह हर वर्ष होता है।</p>
<p>इन्दौर जब भी जाना होता है, मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। यह शहर मेरे लिए तीर्थस्थान की तरह है। जो कुछ सुंदर और अच्छा है उसे हम तीर्थस्थानों में खोजते हैं। इन्दौर का मेरे जीवन में खास महत्व है क्योंकि यहां ओमप्रकाश रावल, महेन्द्र भाई, गुरूजी यानी विष्णु चिंचालकर, काशीनाथ त्रिवेदी और राहुल बारपुते जैसी हस्तियां थी, जो अपने-अपने क्षेत्र में शिखर पर थे। श्रद्धा और सम्मान इसलिए भी ज्यादा होता है क्योंकि मुझे न केवल इन सबका सानिध्य प्राप्त हुआ बल्कि पुत्रवत स्नेह भी मिला।</p>
<p>साल में अलग-अलग विषयों पर होने वाले व्याखयान ने अब एक परंपरा का रूप ले लिया है। यह केवल रस्मी तौर पर नहीं, बल्कि जनजीवन से जुड़े ज्वलंत विचारों के आदान-प्रदान का मंच है। इस आयोजन से राकेश दीवान, चिन्मय मिश्र व सिद्धार्थ भाई जैसे विचारवान लोग जुडे हुए हैं। इस बार रावल जी के पुत्र असीम और उनकी पत्नी लोरा भी इस कार्यक्रम में आई थीं।</p>
<p>जाल सभागृह का हाल खचाखच भरा हुआ था। इस बार व्याखयान देने कृषि विशेषज्ञ देवेन्दर शर्मा आए थे। विषय था- खाली होती थालीः गहराता खाद्यान्न संकट। यह विषय मौजूं है विषय था- इस वर्ष महंगाई ने सबको रूला दिया। दाल के दाम इतने बढ गए कि लोगों की पहुंच से बाहर हो गए। इसके अलावा बीटी बैंगन का मामला भी सामने आया जिसका देश भर में काफी विरोध हुआ। और अंततः बीटी बैंगन को फिलहाल मंजूरी नहीं मिली।</p>
<p>ओमप्रकाश रावल समाजवादी चिंतक व विचारक होने के साथ अपने उतरार्ध जीवन में एक एक्टिविस्ट हो गए थे। चाहे नर्मदा बचाओ आंदोलन हो, एकता परिषद हो या होशंगाबाद का किसान आदिवासी संगठन। वे इनके कार्यक्रमों में जरूर पहुंचते। और लौटकर अखबारों में उस पर लिखते।</p>
<p>असल में रावल जी छोटे-छोटे जन संगठनों से ही एक वैकल्पिक शक्ति के निर्माण का सपना देख रहे थे। वे एक बेहतर का सपना देख रहे थे। इसी को वे रियल पॉलिटिक्स कहते थे। उल्लेखनीय है कि वे आपातकाल के दौरान मीसा के तहत बंदी रहे और १९७७ में जनता शासन में शि राज्यमंत्री भी रहे।</p>
<p>रावल जी अपने लंबे राजनैतिक व सामाजिक जीवन के अंतिम वर्षों में दलगत राजनीति से अलग होकर मैदानी जन संगठनों से जुड़ गए थे और उनमें लगे युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं में संभावनाएं देखते थे। उन्होंने कई सामाजिक कार्यकर्ता बनाए और प्रशिक्षित किए। उनमें से कई पत्रकार व अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं।</p>
<p>रावल जी की एक खासियत और थी, वे बहुत ही सादगी पसंद व्यक्ति थे। सहज और मिलनसार तो थे ही। वे मितभाषी होते हुए भी दूसरों को लंबी-चौडी बातें सुनने का धीरज रखते थे। नपे-तुले शब्दों में कही गई उनकी बात हमारे जैसे कार्यकर्ताओं को सीख की तरह होती थी।</p>
<p>महेन्द्र भाई सर्वोदय प्रेस सर्विस के संस्थापक संपादक थे। वे इसके माध्यम से हमेशा मैदानी जन संगठनों व उनके मुद्‌दे सामने लाते रहे। जल, जंगल, जमीन, खदान, विस्थापन, बडे बांध, पर्यावरण पर जोर देते थे। वे सप्रेस के माध्यम से हमेशा नए-नए लेखकों को तैयार करते थे। मेरे जैसे न जाने कितने लोगों की सप्रेस पाठशाला होती थी।</p>
<p>सप्रेस का कोई व्यवस्थित दफतर भी नहीं था, घर के छोटे से कमरे से ही उनका सब काम-काज होता था। वे एक छोटी सी टेबल पर ही सारा लेखन व संपादन का सभी कार्य करते थे। यहीं से पूरे देश के अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं को सप्रेस का बुलेटिन भेजते। इस काम में उन्हें पूरे घर के सदस्यों का सहयोग मिलता। यहां तक उनके पोता भी लिफाफे पर गोद लगाता था। वे कहते थे कि जैसे किसान को खेती करनी है तो खेत पर रहना पड़ता है। इसलिए घर और दफतर अलग बनाने की जरूरत नहीं है।</p>
<p>सप्रेस का ५० वां वर्ष चल रहा है। वह वैकल्पिक मीडिया की वाहक रही है। १९६० में इन्दौर आए विनोबा भावे से मात्र एक रूप्ये की सहयोग राशि लेकर सप्रेस की शुरूआत महेन्द्र भाई ने की थी जिसके ५० वां वर्ष चल रहा है। कार्यकारी संपादक चिन्मय मिश्र हैं और इसमें उनके दोनों बेटे सिद्धार्थ और सम्यक भी लगातार अपना योगदान कर रहे हैं।</p>
<p>मालवा की इन दोनों हस्तियों की स्मृति में हुआ कार्यक्रम बहुत आत्मीय था। और कार्यक्रम समाप्ति के बाद मैं सोच रहा था कि क्या हम इन महान विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से कुछ सीखकर आगे कुछ कर पाएंगे?</p>
<br />Filed under: <a href='http://juggnu.wordpress.com/category/people/'>People</a> Tagged: <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/indore/'>Indore</a>, <a href='http://juggnu.wordpress.com/tag/sps/'>SPS</a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gofacebook/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/facebook/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gotwitter/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/twitter/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/juggnu.wordpress.com/27/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/juggnu.wordpress.com/27/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=27&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></content:encoded>
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		<title>’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ पर पाठकीय प्रतिक्रिया</title>
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		<pubDate>Thu, 14 Jan 2010 18:35:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पर्यावरण बचे पर लोग भी बचें वीरेन्द्र दुबे ‘सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नाम की छोटी सी किताब अपने नाम से ही मोहती है। खासकर उन लोगों को जो नर्मदा विंध्यांचल के समानान्तर अमरकंटक से असीरगढ़ तक विशाल पर्वतमाला के रूप में सतपुड़ा को पहचानते हैं। किताब में इस विशाल भूभाग के एक जिले (होशंगाबाद) के तीन [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=19&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पर्यावरण बचे पर लोग भी बचें<br />
वीरेन्द्र दुबे</p>
<p>‘सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नाम की छोटी सी किताब अपने नाम से ही मोहती है। खासकर उन लोगों को जो नर्मदा विंध्यांचल के समानान्तर अमरकंटक से असीरगढ़ तक विशाल पर्वतमाला के रूप में सतपुड़ा को पहचानते हैं।</p>
<p>किताब में इस विशाल भूभाग के एक जिले (होशंगाबाद) के तीन ब्लाकों के कुछ गांवों की झलकियां बहुत सार संक्षेप बल्कि सूत्र रूप में दिखलाने का कमाल किताब के लेखक बल्कि कुशल संग्राहक बाबा मायाराम ने किया है।</p>
<div id="attachment_20" class="wp-caption alignleft" style="width: 184px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/book_satpuda-ke-bashinde.jpg"><img class="size-medium wp-image-20" title="Satpuda ke Bashinde" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/book-3d-final-psd.jpg?w=174&#038;h=254" alt="" width="174" height="254" /></a><p class="wp-caption-text">सतपुड़ा के बाशिन्दे</p></div>
<p>मोटे तौर पर यह किताब विस्थापन और उससे जुड़े सीधे असर पर केन्द्रित है। मगर किताब में मौजूद सामग्री, पर्वतमाला में भौगोलिक, सांस्कृतिक और कथित विकास के चलते हो रहे बदलावों की तरफ बरबस ध्यान खींचते ही नहीं बल्कि वहीं अटका भी देते हैं।</p>
<p>हमें सोचने-विचारने और कम से कम अपने स्तर पर करने की प्रेरणा देने की सफल कोशिश किताब के छोटे-छोटे शिर्शकों में बंटे वृतांत्त अपने सवालों की लम्बी कतारों के साथ मौजूद हैं। जो इसे देशव्यापी और एक हद तक बुनियादी त्रासदियों की तरफ ध्यान आकर्षित करने से नहीं चूकते।</p>
<p>किताब की झलकियां हमारे सामने ऐसे-ऐसे सजीव दृश्य पेश करती चलती हैं कि पढ़ने के साथ देखने और सुनने का सुख भी देती है। क्योंकि आम तौर पर इस तरह के मुद्दों पर लिखा जाने वाला साहित्य शुष्क , आंकड़ेबाजी का गट्ठा और बयानों वक्तव्यों की टोकरी होता है। उसकी भाषा और लहजा भी उसको अपठनीय जरूर बना देता है। सतपुड़ा के बाशिन्दे इस मायने में एक बेहतर उदाहरण है। इस तरफ भी पढ़ने और कुछ करने वालों को विचारने के लिए किताब उकसाती है।</p>
<p>बच्चे नौजवान, महिलाओं और बुजुर्गों के वर्गों के विचारों और सम्वेदनाओं के साथ साझेदारी करके इन रपटों को व्यापक अर्थ मंे सांस्कृतिक दस्तावेज की शक्ल दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, मानव अधिकार और लोक संस्कृति जैसी चुनौतियों से जुड़ी चिन्तायें मजबूर करती हैं कि जब इतने में सेम्पिल एरिया में यह स्थिति है तो इस लम्बी-चैड़ी फैली पर्वतमाला की समग्र तस्वीर क्या होगी? क्या वह इससे अलग है? मिलती-जुलती है? अथवा और भी विविध मुद्दे इन बाशिन्दों के भूत, वर्तमान और भविष्य के प्रभावित किए हुए हैं।</p>
<p>लेखक ने जिस मेहनत और गागर में सागर समेटने के शिल्प का इस्तेमाल किया है, वह उसमें यह अपेक्षा भी जगाता है वह सेम्पिल टेस्टिंग की बजाय और लोगों को जोड़कर अमरकंटक से असीरगढ़ तक लम्बाई-चैड़ाई में फैले सतपुड़ा पर्वत और उसके बाशिन्दों की व्यथा को दस्तावेजीकरण करने की इस शेली में पढ़ने, सोचने और कुछ करने की इच्छा-आकांक्षा रखने वालों के लिए उपकार होगा।</p>
<p>किताब के मुखपृष्ठ पर इंदिरा नगर के बच्चे सुखीराम का बाघ का मोहक चित्र और अखीरी कवर पर भवानी प्रसाद मिश्र की सतपुड़ा के घने जंगल का एक अंष किताब को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका के तौर पर उभरकर आए हैं।</p>
<p>विपरीत परिस्थितियां, विकराल समस्याओं व विरोधाभासों से भरी विनाशकारी विकास योजनाओं के लिए रचनात्मकता से भरी पूरी संभावनाओं की तरफ रिपोर्ट बार-बार इशारा करती है।</p>
<p>किताब पर्यावरण की रक्षा और रोजी-रोटी के गहरे सम्बंधों के मानवीय नजरिये से देखने के नीति निर्धारकों को कटघरे में खड़े करके ईमानदार बयान और कारगर उपायों की पुरजोर मांग भी करती है।</p>
<p>किताब के साथ कापीराइट का चक्कर न होना क्षेत्र के छोटे अखबारों के लिए शानदार मौका है। वे इस सामग्री का, इसके आधार पर अपने इलाके का कच्चा चिट्ठा लोगों के सामने रख सकते हैं। कम ज्यादा समस्याओं से तो पूरा पहाड़ जूझ रहा है और उसे कुछ सूझबूझ नहीं रहा है। लोगों के लिए ईमानदारी से लिखने -कहनेवालों के लिए किताब कमाल की आधारभूमि है। वे इसका उपयोग करें।</p>
<p>किताब की विश्वनीयता उसमें दर्ज लोगों के वेबाक बयान हैं जिनमें उनकी विवशता और विश्वास दोनों अलग-अलग तरीके से झलकते हैं। यहां कुछ उदाहरण हैं जो अपने में किसी कहानी कविता के हिस्सों जैसा अहसास कराते हैं। जीवंत कथाओं के पढ़ने वालों के लिए ये किताब भी समान सुख देगी। कुछ उदाहरण हैं जिन पर गौर करें।</p>
<p>&#8220;जब कोई चिड़िया का घौंसला तोड़ देता है तो उसे बनाने में कितनी मुशिकल होती है फिर हमारा तो पुराना घर था, जमीन थी, पेड़ों की घनी छांव थी, वहां का वातावरण ठंडा था। हमें वहां से हटा दिया, न कोई मुआवजा मिला न जमीन। 30 साल बाद भी हमें पुराने गांव की वैसी ही याद आती है जैसे वह कल ही की बात हो।&#8221;</p>
<p>&#8220;हम सिर्फ बाजार से नमक और कपड़ा खरीदते हैं। बाकी जरूरत की चीजें अपने खेत में ही पैदा करते हैं। यहीं हम अच्छे हैं। जंगल से बाहर हमें ऐसी हरी-भरी खेती, पर्याप्त पानी,जंगल पहाड़ और आजादी कहां मिलेगी?&#8221;</p>
<p>&#8220;बचपन की बहुत सी अच्छी यादें हैं। हम जंगल से माहुल के फल खाते थे। अचार, तेंदू, महुआ खाते थे। नदी में कूद-कूदकर नहाते थे। वहां ठंडा वातावरण रहता था। पेड़ों की छांव में खेलते थे। लेकिन अब हमारी पूरी जिंदगी बदल गई।&#8221;</p>
<p>&#8220;मैं बहुत अकेला हो गया हूं। में घर में यहां आने के बाद बीमारी से पांच मौतें हो गयी हैं। जो पैसा था सब खत्म हो गया। घर में जो जेवर गहने थे वे भी बिक गये। घर में खाने केा नहंी है तो इलाज कहां से करवाएं?&#8221;</p>
<p>&#8220;हमें जंगल में बेरोकटोक घूमना अच्छा लगता है। वहां की हरियाली भाती है, वहां अपनी सहेलियों के साथ जंगल जाना अच्छा लगता है। वहां आजादी है, अपनी जिंदगी में किसी का दखल नहीं है। अब हमें पता नहीं नई जगह पर यह सब मिलेगा या नहीं ?&#8221;</p>
<p>इन जैसे दर्जनों बयान हों या शीर्षक उपशीर्षकों में बंटी किताब कें कथन हों जैसे- उजड़े-उखड़े गांव- एक शिक्षक कैसे पढाएगा पांच कक्षाओं को। नीमघान- अमीरों का सैर-सपाटा आदिवासियों के जीवन में अंधेरा। इंदिरा नगर- न वे ढोल हैं, न वह मस्ती हैं। तवा के मछुआरे- मालिक से वापस चोर, छींदापानी- विस्फोटों से उखड़ते जीवन के परखच्चे, गाजनिया बेड़ा- पहले महुआ खाते थे, वह भी छिन गया, विस्थापन के डर से सहमी है जंगल की बेटियां। न बिजली न डीजल फिर भी होती है सिंचाई। ये शीर्षक अपने में ही एक पूरा वक्तव्य भी हैं, पढने वालों को सहज ही उन संवेदनाओं से जोड़ने में मदद करते हैं।<br />
किताब को सहयोग देकर पढ़ने को लिया जाये तो लेखक को मदद भी मिलेगी और हिम्मत भी।</p>
<p><em>वीरेन्द्र दुबे, पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों में बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री के निर्माण में सक्रिय भूमिका। जंगल पहाड़ और वहां रहने वाले लोगों से गहरा जुड़ाव।</em></p>
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		<title>मध्यप्रदेश में नई राजनीति की शुरूआत</title>
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		<pubDate>Thu, 07 Jan 2010 12:27:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=13&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_15" class="wp-caption alignright" style="width: 310px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/picture-090.jpg"><img class="size-medium wp-image-15" title="Faagram" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/picture-090.jpg?w=300&#038;h=200" alt="" width="300" height="200" /></a><p class="wp-caption-text">फागराम </p></div>
<p>आम के पेड़ के नीचे बैठक चल रही है। इसमें दूर-दूर के गांव के लोग आए हैं। बातचीत हो रही है। यह दृश्य मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के आदिवासी बहुल केसला विकासखंड स्थित किसान आदिवासी संगठन के कार्यालय का है। यहां 5 जनवरी को किसान आदिवासी संगठन की मासिक बैठक थी जिसमें कई गांव के स्त्री-पुरुष एकत्र हुए थे। जिसमें केसला, सोहागपुर और बोरी अभयारण्य के लोग भी शामिल थे। इस बार मुद्दा था- पंचायत के उम्मीदवार का चुनाव प्रचार कैसे किया जाए? यहां 21 जनवरी को वोट पडेंगे।</p>
<p>बैठक में फैसला लिया गया कि कोई भी उम्मीदवार चुनाव में घर से पैसा नहीं लगाएगा। इसके लिए गांव-गांव से चंदा इकट्ठा किया जाएगा। चुनाव में मुर्गा-मटन की पारटी नहीं दी जाएगी बल्कि संगठन के लोग इसका विरोध करेंगे। गांव-गांव में साइकिल यात्रा निकालकर प्रचार किया जाएगा। यहां किसान आदिवासी संगठन के समर्थन से एक जिला पंचायत सदस्य और चार जनपद सदस्य के उम्मीदवार खड़े किए गए हैं।</p>
<p>सतपुड़ा की घाटी में किसान आदिवासी संगठन पिछले 25 बरस से आदिवासियों और किसानों के हक और इज्जत की लड़ाई लड़ रहा है। यह इलाका एक तरह से उजड़े और भगाए गए लोगों का ही है। यहां के आदिवासियों को अलग-अलग परियोजनाओं से विस्थापन की पीड़ा से गुजरना पड़ा है। इस संगठन की शुरूआत करने वालों में इटारसी के समाजवादी युवक राजनारायण थे। बाद मे सुनील आए और यहीं के होकर रह गए। उनकी पत्नी स्मिता भी इस संघर्ष का हिस्सा बनीं। राजनारायण अब नहीं है उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है। लेकिन स्थानीय आदिवासी युवाओं की भागीदारी ने संगठन में नए तेवर दिए।</p>
<p>इन विस्थापितों की लड़ाई भी इसी संगठन के नेतृत्व में लड़ी गई जिसमें सफलता भी मिली। तवा जलाशय में आदिवासियों को मछली का अधिकार मिला जो वर्ष 1996 से वर्ष 2006 तक चला। आदिवासियों की मछुआ सहकारिता ने बहुत ही शानदार काम किया जिसकी सराहना भी हुई। लेकिन अब यह अधिकार उनसे छिन गया है। तवा जलाषय में अब मछली पकड़ने पर रोक है। हालांकि अवैध रूप से मछली की चोरी का नेटवर्क बन गया है।</p>
<p>लेकिन अब आदिवासी पंचायतों में अपने प्रतिनिधित्व के लिए खड़े हैं। इसमें पिछली बार उन्हें सफलता भी मिली थी। उनके के ही बीच के आदिवासी नेता फागराम जनपद उपाध्यक्ष भी बने। इस बार फागराम जिला पंचायत सदस्य के लिए उम्मीदवार हैं। फागराम की पहचान इलाके में तेजतर्रार, निडर और ईमानदार नेता के रूप में हैं। फागराम केसला के पास भुमकापुरा के रहने वाले हैं। वे पूर्व में विधानसभा का चुनाव में उम्मीदवार भी रह चुके हैं।</p>
<div id="attachment_14" class="wp-caption alignleft" style="width: 273px"><a href="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/picture-062.jpg"><img class="size-medium wp-image-14" title="Sangharsh jaari hai" src="http://juggnu.files.wordpress.com/2010/01/picture-062.jpg?w=263&#038;h=165" alt="" width="263" height="165" /></a><p class="wp-caption-text">संघर्ष जारी है </p></div>
<p>संगठन के पर्चे में जनता को याद दिलाया गया है कि उनके संघर्ष की लड़ाई को जिन प्रतिनिधियों ने लड़ा है, उसे मजबूत करने की जरूरत है। चाहे वन अधिकार की लड़ाई हो या मजदूरों की मजदूरी का भुगतान, चाहे बुजुर्गों को पेंशन का मामला हो या गरीबी रेखा में नाम जुड़वाना हो, सोसायटी में राषन की मांग हो या घूसखोरी का विरोध, यह सब किसने किया है?</p>
<p>जाहिर है किसान आदिवासी संगठन ही इसकी लड़ाई लड़ता है। किसान आदिवासी संगठन राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी जन परिषद से जुड़ा है। समाजवादी जन परिषद एक पंजीकृत राजनैतिक दल है जिसकी स्थापना 1995 में हुई थी। समाजवादी चिंतक किशन पटनायक इसके संस्थापकों में हैं। किशन जी स्वयं कई बार इस इलाके में आ चुके हैं और उन्होंने आदिवासियों की हक और इज्जत की लड़ाई को अपना समर्थन दिया है।</p>
<p>सतपुड़ा की जंगल पट्टी में मुख्य रूप से गोंड और कोरकू निवास करते हैं जबकि मैदानी क्षेत्र में गैर आदिवासी। नर्मदा भी यहां से गुजरती है जिसका कछार उपजाउ है। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध पचमढ़ी भी यहीं है।</p>
<p>होशंगाबाद जिला राजनैतिक रूप से भिन्न रहा है। यह जिला कभी समाजवादी आंदोलन का भी केन्द्र रहा है। हरिविष्णु कामथ को संसद में भेजने का काम इसी जिले ने किया है। कुछ समर्पित युवक-युवतियों ने 1970 के दशक में स्वयंसेवी संस्था किशोर भारती को खड़ा किया था जिसने कृषि के अलावा षिक्षा की नई पद्धति होषंगाबाद विज्ञान की शुरूआत भी यहीं से की , जो अन्तरराष्ट्रीय पटल भी चर्चित रही। अब नई राजनीति की धारा भी यहीं से बह रही है।</p>
<p>इस बैठक में मौजूद रावल सिंह कहता है उम्मीदवार ऐसा हो जो गरीबों के लिए लड़ सके, अड़ सके और बोल सके। रावल सिंह खुद की स्कूली शिक्षा नहीं के बराबर है। लेकिन उन्होंने संगठन के कार्यकर्ता के रूप में काम करते-करते पढ़ना-लिखना सीख लिया है।</p>
<p>समाजवादी जन परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुनील कहते है कि हम पंचायत चुनाव में झूठे वायदे नहीं करेंगे। जो लड़ाई संगठन ने लड़ी है, वह दूसरों ने नहीं लड़ी। प्रतिनिधि ऐसा हो जो गांव की सलाह में चले। पंचायतों में चुप रहने वाले दब्बू और स्वार्थी प्रतिनिधि नहीं चाहिए। वे कहते है कि यह सत्य, न्याय व जनता की लड़ाई है।</p>
<p>अगर ये प्रतिनिधि निर्वाचित होते हैं तो राजनीति में यह नई शुरूआत होगी। आज जब राजनीति में सभी दल और पार्टियां भले ही अलग-अलग बैनर और झंडे तले चुनाव लड़ें लेकिन व्यवहार में एक जैसे हो गए हैं। उनमें किसी भी तरह का फर्क जनता नहीं देख पाती हैं। जनता के दुख दर्द कम नहीं कर पाते। पांच साल तक जनता से दूर रहते हैं।</p>
<p>मध्यप्रदेश में जमीनी स्तर पर वंचितों, दलितों, आदिवासियों, किसानों और विस्थापितों के संघर्श करने वाले कई जन संगठन व जन आंदोलन हैं। यह मायने में मध्यप्रदेश जन संगठनों की राजधानी है। यह नई राजनैतिक संस्कृति की शुरूआत भी है। यह राजनीति में स्वागत योग्य कदम है।</p>
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		<title>जलवायु परिवर्तन के दौर में बाबा आमटे की याद</title>
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		<pubDate>Sun, 03 Jan 2010 16:58:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Baba Mayaram</dc:creator>
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		<description><![CDATA[हाल ही में खबर आई कि नर्मदा घाटी में बाबा आमटे को याद किया गया। मौका था बाबा की जन्मदिन की वर्षगांठ का। बड़वानी जिले की कसरावद में किसानों, आदिवासियों और मछुआरों ने बाबा के आंदोलन व संघर्ष में योगदान  का स्मरण किया। इस मौके पर ग्रामीणों के अलावा आंदोलन के सक्रिय साथी रहमत भाई [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=juggnu.wordpress.com&amp;blog=11177198&amp;post=5&amp;subd=juggnu&amp;ref=&amp;feed=1" width="1" height="1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>हाल ही में खबर आई कि नर्मदा घाटी में बाबा आमटे को याद किया गया। मौका था बाबा की जन्मदिन की वर्षगांठ का। बड़वानी जिले की कसरावद में किसानों, आदिवासियों और मछुआरों ने बाबा के आंदोलन व संघर्ष में योगदान</p>
<div class="wp-caption alignleft" style="width: 297px"><img style="border:black 2px solid;margin:2px;" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/en/1/10/Baba_Amte_(1914-2008).jpg" alt="" width="287" height="231" /><p class="wp-caption-text">बाबा आमटे</p></div>
<p> का स्मरण किया। इस मौके पर ग्रामीणों के अलावा आंदोलन के सक्रिय साथी रहमत भाई और मेधा पाटकर भी थे। बाबा के चित्र पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरूआत की गई। इस अवसर पर आंदोलन के लिए समर्पित रहे पत्रकार साथी संजय संगवई को भी याद किया गया।</p>
<p>उन्हें याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज जलवायु परिवर्तन पर बड़ा हल्ला हो रहा है लेकिन बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा और मेधा पाटकर जैसे लोगों ने इस खतरे को पहले ही भांप लिया था और इसके बारे में चेतावनी दे दी थी। लेकिन उसे हमने अनुसुना कर दिया और विकास की रट लगाए सीमित प्राकृतिक संसाधनों की बेतहाशा लूट करते रहे और पर्यावरण बिगाडते रहे। आज हालत यह हो गई है कि पर्यावरण का गहरा संकट आसन्न है। धरती का तापमान बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्रीय मछलियां मर रही हैं। समुद्र तट पर बसे देशों के जलमग्न होने का खतरा है।</p>
<p>बाबा यानी मुरलीधर देवीदास आमटे। यह बाबा का असली नाम था। उनका जन्म 26 दिसंबर 1914 में महाराष्ट्र के एक गांव में हुआ था। यद्यपि उनका ताल्लुक जमींदार परिवार से था लेकिन वे इतने संवेदनशील थे कि रास्ते में गिरे पड़े एक मृतप्राय कोढ़ी की दशा देखकर द्रवित हो गएं। उसकी न केवल उन्होंने मदद की बल्कि उनके जैसे कुष्ठ रोगियों की सेवा में बरसों जुटे रहे। अब बाबा हमारे बीच नहीं है। उनका 9 फरवरी, 2008 को निधन हो गया है। लेकिन आज भी उनके समाजसेवी दोनों बेटे, बहुएं और पोते उस को आगे बढ़ा रहे हैं।</p>
<p>बाबा ने अपने जीवन में रचना और संघर्ष के दोनों कामों को समान महत्व दिया और इसके लिए ठोस रूप में काम किया। उन्होंने जो कहा वह किया। उनकी कथनी-करनी एक थी। उनके रचना के कामों में आनंदवन है तो नर्मदा घाटी में चल रहा संघर्ष है। यह सब हमारे सामने है।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 360px"><img class=" " style="border:black 2px solid;margin:2px;" src="http://www.instablogsimages.com/images/2008/02/09/baba-amte-passes-away_26.jpg" alt="" width="350" height="227" /><p class="wp-caption-text">नर्मदा के किनारे</p></div>
<p>मध्यप्रदेश में नर्मदा तट के किनारे कसरावद में बाबा लगभग एक दशक तक रहे। उन्होंने नर्मदा घाटी में चल रहे बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन को संबल प्रदान किया। यद्यपि बाबा ने अपने सामाजिक जीवन की शुरूआत कोढ़ग्रस्त रोगियों की सेवा से की लेकिन वे हमेषा शारीरिक कोढ़ से ज्यादा खतरनाक मानसिक कोढ़ को मानते थे। वे मानते थे कि देश मानसिक रूप से कोढ़ग्रस्त है। वे इसके खिलाफ लगातार चेतना जगाने-फैलाने की कोशिश करते रहे।</p>
<p>इसके लिए उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा भी की। उन्होंने बड़े बांधों के बारे में न केवल सवाल उठाया बल्कि उनके खिलाफ संघर्ष में कूदे भी। विकास की पूरी अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर दिए। वे अपने नाजुक स्वास्थ्य के बावजूद करीब एक दशक तक नर्मदा के किनारे रह कर सबके प्रेरणास्त्रोत बने रहे। यह स्थान संघर्ष का प्रतीक बन गया। नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान ही मुझे उन्हें देखने-सुनने का मौका मिला।</p>
<p>पहली बार मैंने बाबा आमटे को मैंने हरसूद के संकल्प मेले में देखा। मध्यप्रदेश के खंडवा के पास हरसूद में 28 सितबर, 1989 को बड़े बांध के खिलाफ संकल्प मेला आयोजित हुआ था। इस मेले में करीब 40 हजार लोग जुटे थे जिसमें ’बांध नहीं बनेगा, कोई नहीं हटेगा’ का नारा गूंजा था। यहां सिने तारिका शबाना आजमी भी आई थीं। और कर्नाटक के प्रख्यात साहित्यकार व पर्यावरणविद् शिवराम कारंत भी शामिल हुए थे। यहां आए लोगों ने मौजूदा विकास के बारे में सवाल उठाए थे और उसकी निरर्थकता बताई थी।</p>
<p>बाबा वहां मंच पर लेटे हुए अपनी चिर-परिचित मुस्कान बिखेर रहे थे और सबके आकर्षण के केंद्र बने हुए थे। यहां कलागुरू विष्णु चिंचालकर ने एक स्तंभ भी बनाया था। अब हरसूद भी डूब गया है और वह स्तंभ भी। पर वे सवाल आज भी खड़े है, जो उस समय उठाए गए थे। हमें कैसा विकास चाहिए? इस मेले में संकल्प लिया गया था कि हम विनाशकारी विकास की योजनाएं नहीं चलने देंगे।</p>
<p>नर्मदा घाटी में बाबा को देखने-सुनने के और भी मौके आए। उस समय में इंदौर में कानून की पढ़ाई कर रहा था और नईदुनिया में अंशकालिक काम भी कर रहा था। एक बार तो मैं 15 दिनों तक पदयात्रा में शामिल रहा। बहुत ही उत्साहजनक वातावरण था। यहां मैंने देखा बाबा के आसपास ही महत्वपूर्ण लोगों का जमघट लगा रहता है। कोई भी निर्णय लेने से पहले बाबा की राय जरूरी समझी जाती थी। मीडिया तो हमेशा ही उन्हें घेरे रहता था। लोगों के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता और चिंता होती थी।</p>
<p>एक बार किसी स्थान पर सभा शाम को देर तक खिंचने लगी तो बाबा ने कहा- ’अब बस करो, भूखे पेट के कान नहीं होते।’ ऐसा वे ही कह सकते थे। उन्होंने बरसों तक कोढी रोगियों की सेवा में बिताए थे। उन्हें समाज में स्वाभिमान व सम्मान का दर्जा दिलाया। वे जो भी करते थे समर्पित भाव से ही करते थे।</p>
<p>बाबा कठोर संकल्प वाले व्यक्ति थे। उनकी संकल्पशक्ति का लोहा देश-दुनिया मानती है। आनंदवन व हेमलकसा इसका जीता-जागता उदाहरण है। वे बहुत भावुक इंसान थे। एक बार किसी व्यक्ति को आनंदवन में गुलाब का कांटा लग गया था तो लहूलुहान हो गया। बाबा ने कांटे वाले गुलाब की जगह कांटारहित गुलाब का पौधा तलाश किया, जो उन्हें किसी मित्र ने ढूंढकर लाकर दिया।</p>
<p>बड़वानी के पास राजघाट से शुरू हुई यात्रा में बहुत उत्साह था। गीत-गाने और नारों के साथ पदयात्रा आगे बढ़ रही थी। इसमें निमाड़-मालवा के 5 सौ से ज्यादा लोग होंगे। लोग खाने की सामग्री व बिस्तर अपने साथ लेकर चल रहे थे। बड़ी संख्या में शहरों से आए युवक-युवतियां शामिल थे। उनके खाने-पीने की जिम्मेदारी गांवों के लोगों की थी। हर गांव के साथ कुछ लोगों की टीम कर दी गई थी, जो उनके साथ ही खाती-पीती थी।</p>
<p>गुजरात की सीमा पर स्थित फेरकुआं में गुजरात सरकार ने पदयात्रा को रोक दिया। दमन भी हुआ था। गुजरात की सीमा में जाने वाले जत्थों को मारा-पीटा गया था। आंदोलनकारियों ने कई दिनों तक खुले आसमान के नीचे कड़कड़ाती ठंड में रातें गुजारीं। बाबा ने दमन के खिलाफ धरना दिया। वे कहते थे विनाश नहीं, विकास चाहिए।</p>
<p>बाबा ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई युवकों को प्रभावित किया जिनमें से आज विविध तरह के सामाजिक काम में जुटे हैं। आजकलं छत्तीसगढ़ में कार्यरत जेकब नेल्लीथानम बरसों से कृषि की परंपरागत पद्धतियों पर काम कर रहे हैं। वे बाबा के साथ भारत जोड़ो अभियान में केरल से ही साइकिल से आए थे। हिमांशु ठक्कर जल विशेषज्ञ हैं। समाज प्रगति सहयोग बागली(मध्यप्रदेश) में बाबा की प्रेरणा से ही अपना काम आगे बढ़ा रहा है। यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है। कुछ लोगों का नाम छूट भी सकते है। लेकिन यहां मकसद यह नहीं है। यानी बाबा के कामों और विचारों से अनेक लोगों ने प्रेरणा प्राप्त की और आज भी कर रहे हैं।</p>
<p>बाबा गांधी के सच्चे अनुयायी थे। आज जब दुनिया गांधी के रास्ते की ओर देख रही है, तब उनकी याद आना स्वाभाविक है। मौजूदा विकास की नीतियों व पद्धतियों ने दुनिया के अमीर देश अमरीका व यूरोप में प्रदूषण का स्तर बढ़ा लिया है। जहरीली गैसों से अपने देशों को घेर लिया है। वे अब तीसरी दुनिया की ओर देख रहे हैं। अपना प्रदूषण कम नहीं कर रहे हैं पर तीसरी दुनिया पर कम करने के लिए दबाव डाल रहे हैं।</p>
<p>आज का पर्यावरण का संकट भी भोगवादी जीवनशेली की देन है। अपने ऐसी जीवनशॆली को अपनाया है जिसकी परिणति सामने है। अब हमे प्राकृतिक संसाधनों जल, जंगल, जमीन को बचाने की ओर बढ़ना चाहिए। यह प्राकृतिक संसाधन हमारे ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के भी हैं। यही बाबा भी अपने शब्दों में कहते थे। बाबा की सोच व काम हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।<img class="aligncenter" title="डोंगी" src="http://www.narmada.org/images/omkareshwar/f1120030.jpg" alt="" width="364" height="559" /></p>
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